#62 The Day of Retirement

 समधी साहब, आज (31-03-2023) सेवा निवृत्त हो गये।



नौकरी, ख़ासकर सरकारी, जैसे हवाई जहाज़ का सफर। टेक ऑफ कभी भी किया हो, कहीं से भी किया हो, दूरी कितनी ही रही हो, ऊँचाई कोई भी पकड़ ली हो, मौसम ख्रराब भी हुआ ही होगा कभी-कभार तो, डरावना टर्बुलेन्स, सीट बैल्ट, अब लगाओ, अब खोल सकते हो, सार किसी का, अब कोई भी नी।

सार है तो इतना कि लैण्ड, हर फ्लाइट होती है, एक ना एक दिन, देर-सबेर बात अलग । खुशकिस्मत हैं कि लैण्डिंग सेफ हुई है, हैप्पी हुई है। इतने सारे लोग रिसीव करने आये हैं, सी ऑफ करने भी। अब वक्त, घर लौटने का है, अपनी मर्जी की ज़िन्दगी जीने का है। सफर का कचरा, साथ ले जाने का नी। शुक्रिया उसका, जिसने सहूलियतें दी, सफर खुशनुमा और आसान बनाया, उसका भी जो मुश्किलों का सबब बना, और आपको सबक दे गया, मजबूत और समझदार बना गया।

सफर के गिले-शिकवे-शिकायत होंगे तो, मगर सब कचरा है, साथ ले भी जाना, काए को ? अच्छी यादें, कीमती अनुभव, जगह-जगह खरीदा हुआ, पसन्दीदा सामान, सुनहरे सपने, यही सब साथ ले जाने लायक है। घर सजाइये, संवारिये, और आराम से रहने लायक बनाइये, बनाये रहिये, और भूलिए मत, कि उस घर में, आप ख़ुद भी आते हैं

तो ढेर बधाइयाँ, सारी शुभकामनायें और हार्दिक स्वागत,

"ठलुआ क्लब" में ! 😀👍

#61 रूबरू, एक अर्से बाद 😀

'मुुर्शिद', हमारे साथ, बड़ा हादसा हुआ, हम रह गये, हमारा, ज़माना चला गया !


आभार, उद्धृत पंक्ति, और छायाचित्र के लिये, उनके स्वामियों के 🙏
ये तो है, आपकी शक्ति, आपकी क्षमता, आपकी सुपीरियरिटी पहले जैसी नहीं रही, आपकी ईगो को मिलने वाला दाना पानी कम हो गया, मगर सिर्फ आपका ही नहीं, सभी का, हर किसी का, ज़माना, एक ना एक दिन तो, जाता ही जाता है। किसी का, पहले ही चला गया था, किसी का जाने को तैयार बैठा है, और किसी के पास टाइम, अभी बाकी है, मगर जाना हर किसी का तय है, निश्चित है। देर-सबेर तो हो सकती है, मगर छूटेगा कोई नी, ना तो कोई स्कोप ही है।
आइये, ठीक से समझते हैं।
एक तो ये, कि 'इन्सान' नाम की, जो बेहद काॅम्लीकेटेड मशीन है ना, उसे बनाने की टेक्नीक, यहाँ तो किसी के पास है नहीं, और जहां कहीं, जिसके भी पास है, मोनोपोली है उसकी, उसे जिस भी नाम से पुकारें, डिलीवरी उसी की मर्जी से, उसी के तय समय पर और इस पर, निगोशियेट नहीं कर सकते आप। केवल दरवाजा, खटखटाते, रह सकते हैं। डिलीवरी अनपेक्षित भी हो जाया करती है, कभी-कभार, वैसे ।
ये मशीन आती है, इनबिल्ट लाइफ-लाॅन्ग बैट्री के साथ। चार्ज ये, रोजाना की रोजाना करनी पड़ती है, मगर रिप्लेसमेंट का कोई प्रोविजन नहीं। शुरू का रनिंग इन, मेरा तो विश्वास है, अधिकतम छः सात साल, कानून कहता है 18 साल, फिर कोई चालीस एक साल ठीक-ठाक। उसके बाद तो, प्राब्लम दर प्राब्लम, और ये प्राब्लम बढ़ती ही जाती हैं। बैट्री, अव्वल तो चार्ज पकड़ती ही नहीं, पकड़ ले भी, तो होल्ड नहीं करती। अन्ततः डिस्चार्ज, और फिर स्क्रैप, मतलब जिसका, कोई है ही नहीं !
यह व्यवस्था सतत, सनातन, और एक समान है, पीढ़ी दर पीढ़ी, अन्तर कोई नहीं, चाहे आपके पुरखे हों, या वंशज। मशीनें आकार-प्रकार में, प्रायः एक जैसी ही हुआ करती हैं, और उपयोगी जीवन काल सीमित। जो काम किया करती हैं, या कर सकती हैं वह बदलता रहता है, अलबत्ता, या ऐसा लगता है, बा-वजह कि संसाधन, सुविधायें बेहतर, और बेहतर होती जाती हैं, हम तरक्की कर रहे हैं, इवोल्व हो रहे हैं ना ?
जैसे, अपने पिता को याद करें तो, उन्हें शिक्षा दीक्षा के लिये, पैदल जाना होता था, हमें साइकल उपलब्ध हुई, और बेटे को मोटर साइकिल, उसके बेटे को, शायद कार। संसाधन बेहतर हों तो, जिन्दगी आसान होती जाती है, क्षमतायें बढ़ती जाती हैं। अन्तर यही है, अन्दर खाते, ख़ास कोई नहीं।
तुलना करना, जरूरी ही हो तो मैदान एक सा होना, अनिवार्य है । मेरे एक शिक्षक थे, वजन कोई अस्सी किलो, जबकि हमारा कोई पचास। स्वाभाविक है, उनमें फुर्ती कम पड़ती थी, जल्दी थकने लगते थे। हम उपहास करते तो, वह कहते, तीस किलो वजन, लाद लो पीठ पर, फिर बताना। उनकी बात, अब याद भी आती है, समझ भी, और यही समझना जरूरी भी है।
हममें से कितने ही हैं जिन्होंने पढ़ाई के समय, रिकॉर्ड तोड़ नम्बर प्राप्त किये थे, तहलका मचाया था, पर आज के दौर से तुलना करें तो नई पीढ़ी को, इतने नम्बर, उपहास के लायक ही लगते हैं। मोटर साइकिल चला रहे हैं ना, साइकिल चलाने वाले की कोशिश, समर्पण और परिश्रम कैसे समझ पायेंगे ? आपको भी, इसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । खेल का मैदान, एकसार जो नहीं है।
वक्त वक्त की बात है, मौसम बिल्कुल बदल चुका है। ऊपर से आपकी बैट्री पुरानी हो चुकी है, और नई पीढ़ी की टिप टाॅप। तुलना युक्तियुक्त है ही नहीं, साथ-साथ, चल नहीं पाओगे, तो क्या हुआ ? माँ-बाप, हर जमाने में, खुद अपने पैर जमा कर ही, अपनी सन्तान को आगे भेजते आये हैं। ये बात त्याग की है, उपकार की है, गौरव की है, फर्ज की है, शर्म की नहीं । अब अगर... अगर आपकी यही सन्तान, पीछे मुड़कर, देखना भी गवारा ना करे, तो ये बात कृतघ्नता की, शर्म की, कम से कम, आपके लिये तो, कतई नहीं ?

वैसे बच्चे फर्माबदार हों, बेइन्तहा प्यार करते हों, छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते हों तो भी क्या ? आप अजर-अमर तो होने से रहे ? मंजिल भी, और रास्ते भी, सब पहले से तय हैं, शायद वक्त भी। बाकी सब तो, समझाना है मन का। काम की बात इतनी सी है कि आपका ध्यान जरूरतों पर ही हो, ये कम से कम हों, जितना भी अफोर्ड कर सकें, आकर्षण कम हो जाये, तो भी चलेगा । आपकी जरूरतें, घर की बात होती हैं, ये हालात देखकर थोड़ा-बहुत एडजस्ट भी कर लेतीं हैं। ख्वाहिशें बाजारू, बन सँवर कर आती हैं, बला की कशिश, मगर इन्तहा इनकी कोई नहीं, ये कभी पूरी नहीं होतीं।
कुल मिलाकर, घर वापसी का कोई कन्ट्रोल, आपके हाथ में, है ही नहीं, और जो हाथ में ही नहीं, वो दिमाग में क्या रखना, और काए को ? जाना है, इतना पक्का है, कब जाना है, कैसे जाना है, आराम से, या संघर्ष करते हुये, कौन जाने ? और सबकी दशा एक, अमीर हो, पहलवान हो, लोकप्रिय नेता हो, बड़े से बड़ा अफसर हो, चलती यहाँ किसी की नहीं। फिर डर कर ही, क्या हासिल ? जियो ऐसे कि कभी जाना ही नहीं, सज्ज इतने कि अगले ही पल भी, गिला कोनी।

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।"

अर्थात्‌, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर, दूसरे नये वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा, पुराने शरीरों को त्याग कर, दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।
इस परम सत्य को, स्वीकार कर लेना ही, बुद्धिमानी । करो, या ना भी करो, जाने की प्रक्रिया पर असर, राई रत्ती नहीं। स्वीकार कर लोगे, राजी रहोगे, सज्ज रहोगे तो दर्द थोड़ा कम हो जायेगा, अफसोस भी, और गिला शिकवा-शिकायत भी।

अब मर्जी आपकी ! 😀👍

#60 Why do I come here, so often !



A sea shell, also known simply as a shell, is a hard, protective outer layer usually created by an animal that lives in the sea. The shell is part of the body of the animal, sort of a tough umbrella, and whenever the environment is hostile, the animal feels threatened or insecure, it’ll retract under that. Please note, being real is not necessary, a feel, a perception is enough, even if misconceived. Empty seashells are often found, washed up on beaches by beach combers.

Many senior humans also do behave similarly. They carry a huge load of memories, and if they don’t find understanding takers, they start feeling, promptly so, rejected, dejected and unwanted. They retract into solitude. Factually, all kids overtake their parents one day, sooner or later, and parents feel proud for it. A mission accomplished. The other side of coin, they begin to lag, the distance keeps getting wider with time, and very soon, they find themselves outdated, irrelevant and dropping in the list of priorities of their own kids.

Won’t blame kids. This has been happening since times, immemorial. It’s the darker side of human evolution, and inevitable. It’s just practically impossible to get rid of that, completely and those making special efforts, end up only reducing the pain, through sheer manipulation. Seniors, on their part, retracted into the solitude, live with their memories. Memories, the faithful, that stays familiar, still relevant, therefore cozy and absolutely harmless.

I’m no exception. Kids are wonderful, but I find solace in solitude. Most comfortable with myself. Don’t claim to be God, but in my personal context, I’m no less either. I do what I do. Relive my memories, retrospect and often make conclusive evaluations. They are so dear to me, just like my own kids, even if not very pleasant at times. The key question is, what do I do with them ? So hard to find takers. That’s where the social media platform comes in handy.

I come here often and speak my heart out. Just off loading, no expectations of anyone agreeing with me, let alone following me. I consider myself fortunate when loads of benevolent and considerate reactions pour in. To be honest, I don’t care, either way. I’m done with off-loading, and relieved. It someone likes certain observations, adopts and starts professing, the idea has found its home. The God has smiled. Else, it’s been another day at least, well spent.

# 59 एक दिन - ख़ासमख़ास !


It's a special day today. It's the auspicious day of Goberdhan pujan, pratipada, the first day of native financial year, and it's Deeksha's day, her BIRTHDAY 👆

Deeksha bolen to, our fourth kid, an add-on, later in life. I won't call her different, may be promptly mis-interpreted. So I call her special. Born, brought up, and evolved in a set up, alien to us. An experience, so well-worth waiting. 

They say, liking something, in someone is light-weight, easy and pleasant. Disliking is not. One should wait, try to know, understand more and get really sure, before announcing the negative verdict. 

My perception is, Deeksha is cute, charming, jovial, caring, knowledgeable, hard-working, energetic, enthusiastic, confidence packed, a meticulous planner, an apt manager and a determined acomplisher. She won't let you, escape easy.

A qualified IT engineer, temperamental manager, and a foodie by aptitude, knows well, how to create and how to express. Seen 'Live.Eat.Travel' ? Delicacy, that melts as touched, but spreads to each nook and corner of you, in no time. Love it, or hate it, but can't ignore it type. Not sure of anything, to add otherwise. 

A lucky, priceless package, that we are so pleased, fortunate to have. A day of rejoice, celebrations, indeed. 

We wish Deeksha "a very happy birthday !", indeed, and we mean it. 

So May you have wonderful... wonderful days ahead. May all your dreams, the sensible ones, come true. May you keep smiling, always. May the God keep you blessed, as we do now ✋

Enjoy !


#58 सफरनामा !

आजकल फ्लाइट, और आरक्षित एसी से सफर करने वाले लोग भले आसानी से न समझ पायें, कि कभी हमने ही ट्रेन की साधारण बोगी में भी सफर किया है। और खूब किया है, ये कभी-कभार की बात नहीं। कभी कभी तो डिब्बे में घुस पाना ही दूभर होता था, हाथ में दरवाजे का हैण्डिल, और आधा-अधूरा पैर पायदान पर टिका हुआ, और ट्रेन चल पड़ती थी।

एक बार चल पड़ी तो लोग सैटल होते थे, जगहें बनतीं थीं। पहले दरवाजे से अन्दर होने की, और फिर खिसकते हुये गैलरी में आगे बढ़ पाने की। हम सीट पर बैठे लोगों को हसरत भरी नजरों से, और सीटों पर काबिज लोग हमें, आधी तरस, और आधी चिन्ता भरी नजरों से, देखते थे कि आ गये। देर सबेर, एडजस्ट इन्हें भी करना ही पड़ेगा।

वो तलाश, सीट पर टिकने लायक एक कोने की, और सीट पर काबिज बन्दे की उसे कवर किये रहने की, मगर कब तक ? कामयाबी, अन्ततः मिलती ही थी। अगली कवायद, कब्जा मजबूत करने की, और फैलाने की। अगर कोई सवारी उतर जाये तो मुश्किल, एकाएक आसान हो जाती थी, और अगली कोशिश शुरू हो जाती थी, खिड़की वाली सीट तक पहुँचने की।

रफ्ता-रफ्ता खिड़की तक पहुँचना, सामान मनमर्जी सेट करना, और फिर फैल-फूट कर बैठना। सब हो ही जाता था और तब, आप खुद को डिब्बे का बादशाह समझ सकते थे। खिड़की से सबसे अच्छा नजारा, आपको ही दिखता था। खिड़की बन्द रखनी है, या खुली, और कितनी, फैसला आप ही का। नये मुसाफिरों में से किसको, और कितनी जगह देनी है ? और कब ? देनी भी है ? यह सब भी आप पर।

और फिर, वो स्टेशन भी आ जाता है, जहाँ आपको उतरना है । बैठने की जगह, भले कितने मुश्किल हासिल हुई हो, कितना इन्तजार, टुकड़े टुकड़े हासिल राहत। मगर, अब घेरे रखने का कोई कारण नहीं, ना औचित्य, ना सार्थ। और इसके लिये मुसाफ़िरों से, जिन्हें आगे जाना है, गुत्थमगुत्था होने की क्या ही तुक। यादें समेटिये, और उतर जाइये। सफर का यही मतलब है !

अपने हम-उम्र दोस्तों के लिये, इस किस्से में, एक निहितार्थ भी है। यह कहानी, अपने जीवन की ही तो नहीं। दफ्तर के बाॅस हों, या घर की मालकिन, स्टेशन आ गया तो सीट का मोह त्यागिये और घर जाने को सज्ज होइये, यही योग्य !

आपका दिन शुभ हो।

# 57 Out of the blue



जो त्याज्य है, उसे संजोने की कोशिश शुभ नहीं, सार्थक भी नहीं, और उसके पीछे जीवन नर्क कर लेना ? निरा पागलपन।

कभी पेड़ों को देखियेगा, मौसम-ए-पतझड़ में। पत्तों का गिरना, अन्त ही नहीं, नई शुरुआत भी होती है !

Happy Engineer's day ! (belated)

I was penning it for 15th. The ‘Engineer’s day’, so it’s a delayed delivery, in fact.

But, why are we called 'Engineers'? 

Is it from 'Engine'? Steam engines were made only in the 19th century, whereas, engineering as a profession, came in to existence  centuries before. 

The word 'Engineer' has nothing to do with the word engine. ‘Engineer’ did not originate in engine. The word engineer originated from 'ingenium' which is a Latin word, meaning ingenious, meaning someone, who solves problems that elude normal persons. 

From 'ingenium' came 'ingenieur'  ( which is the French word for engineer even now) and from it came the English word Engineer. 

So, an engineer is not just a warehouse of technical information, stocked in mind, and in hand, during his association with some formal institute. Temperament is of paramount importance. 

Relevant education reinforces the asset, polishes it. A career provides you avenues to practice, attempt converting, hypothetical ideas into real manifestations on the ground. Stocking back, and refine, and dedicate it to the final beneficiary, the common man of the society.

Engineering is not just an education, or training. It's a carefully nurtured mindset. A mindset, that's a keen observer, sharp analyst, ingenious solution seeker, persistent translator of ideas into real solutions, meticulous planner, persistent executioner to finish them to as close to perfection as possible. 

That's an Engineer. With, or without, a formal degree. You may find a brilliant one, in a common mason, or carpenter alike and fail to find one, even in a gold medalist degree holder. No wonder, about one third of my institute-mates, have ventured into non engineering fields, and have delivered exceptionally well. 

The application may vary, the brilliance stays. 

Happy Engineers day !

जय श्री कृष्ण !

*क्या है कृष्ण होने के मायने ?*

♦️पहली गाली पर 'सर काटने' की शक्ति होने बाद भी; यदि 99 और गाली सुनने का 'सामर्थ्य' है, तो वो कृष्ण है।
♦️'सुदर्शन' जैसा शस्त्र होने के बाद भी; यदि हाथ में हमेशा 'मुरली' है, तो वो कृष्ण है।
♦️'द्वारिका' का वैभव होने के बाद भी; यदि 'सुदामा" मित्र है, तो वो कृष्ण है।
♦️'मृत्यु' के फन पर मौजूद होने पर भी; यदि 'नृत्य' है तो, वो कृष्ण है।
♦️'सर्वसामर्थ्य' होने पर भी; यदि 'सारथी' है, तो वो कृष्ण है।

🚩 *जय श्रीकृष्ण* 🚩

- आभार डा. गंगोटिया के !

It's my Birthday Today !


 आज, मैं 64 का हो गया।

वैसे कभी 14 का भी था। जन्म चांदी नहीं, पीतल की ही चम्मच के साथ हुआ था, मगर चम्मच थी साफ सुथरी, और मजबूत। अभाव कोई नहीं, मगर पैसे की कीमत पता रहती थी।

अपना खुद का, जीवन देखूँ तो, भगवान का आशीर्वाद, खुल कर बरसा है। यूँ अपार जैसा तो कुछ भी नहीं, मगर कोई अरमान अधूरा रहा हो, ऐसा भी नहीं। और आसानी से मिला हो, ऐसा भी नहीं। अच्छा ही है, इससे कीमत बनी रहती है। गलतियाँ न हुई हों, ऐसी आशा, ऐसा दावा मैं नहीं करता। मगर गलतियों के डर से, कोशिशों को रुकने, थमने मैंने कभी नहीं दिया। कभी सफलता मिली, तो कभी सीख़।

सीखा है कि जीवन में, हासिल करना ही सब कुछ नहीं, कभी कभार छोड़ने से भी मंगल होता है। और अशुभ हो फिर तो, शुभति शीघ्रम। यादें, आनंद साथ लातीं हों तो ही संजोना ठीक । जो आपके हाथ में था नहीं, और जैसा भी था, बीत ही गया तो बार-बार याद भी क्या ही करना ? बात केवल, दर्द को भुलाने की है। 

माफ़ कीजिए और भूल जाइये, मगर सबक याद रखिये, कीमती होता है। सौन्दर्य नैसर्गिक ही सच, और इसमें योगदान, आपके आचरण, आपकी मनोवृत्ति का भी निश्चित होता है। और मन अच्छा और मजबूत ना रह पाये तो शारीरिक स्वास्थ्य तो भूल ही जायें। कार की रफ्तार ही नहीं, नियंत्रण और ठहराव भी कीमती होता है।

अभी हाल ही में, शहीद पथ पर जाते हुये, एक पुराने से ट्रक को चलते देखा। चढ़ाई विशेष नहीं, मगर दम फूल रहा था, उसका । घिसे टायर, माल ढोते-ढोते चक्कर बहुत लगाये होंगे, बदरंग सी बाॅडी, डगमगाती स्टीयरिंग और धीमे-धीमे लगते, आधे-अधूरे ब्रेक। साथ-साथ चलता, अधीर होता ट्रैफ़िक, हाॅर्न पर हाॅर्न, लगा जैसे ट्रक का योगदान, अब ना आवश्यक रहा, ना प्रासंगिक । हालत जानी पहचानी सी लगी ।

अब शहीद पथ से बचता हूँ, भीड़ में आपकी सहज रफ्तार, किसी के लिये, अनायास ही बाधा, और प्रतिकूल बन जाया करती है । कोई सुनसान सा, वीरान सा रास्ता, ट्रैफिक कम हो, संगीत पसंदीदा हो, यादें खुशनुमा हों और सफर, सहज सा, कोई मंजिल हो तो अच्छा, ना हो तो और भी अच्छा । मन इसी में रमता है, आज-कल । रात के बूढ़े दिये, जो ठहरे। 

जिन जिन सुधिजनों ने अपना-अपना स्नेह और शुभकामनायें आज बरसाईं, सब का दिल से आभार ! आभार उनका भी, जो शुभेच्छु तो थे, पर बता ना सके, कारण जो भी रहा हो। आपको परमपिता का आशीर्वाद प्राप्त हो, आप सभी का मंगल हो।

बर्थ डे मना कैसे ? ये बतायेंगे फिर कभी !

#56 साधन-सुविधा, आराम और ऐशो-आराम !


आज बात, इन तीनों की, जैसा मैं समझ पाया हूँ । 

साधन-सुविधा, यानी जीवन की मूलभूत, अनिवार्य, जरूरतें, जिन्हें पूरा करना, किसी भी शासन व्यवस्था का आवश्यक दायित्व होता है। गरीब की सूखी रोटी, पेट भर जाये तो, धर्म निभ गया। जो मिलता है, जरूरत से कदम-दो कदम, पीछे ही चलता है, और साथ चलने की कोशिश में, लगातार। कभी मक्खन का तड़का, तो समझो त्यौहार हो गया। खाने में स्वाद, और चाव, सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को आता है, और पात्रता इनकी, नैसर्गिक होती है, कमा पायें, या ना कमा पायें।

श्रेणी दो, आराम की, कर्मयोगियों की, रोटी के लाले, इन्हें नहीं पड़ते। हक से मिलती हैं, नियमित और भरपेट। आराम भी, कमाने जैसी चीज़ है, काम की समानुपाती। काम करते-करते, थक के चूर हुये तो आराम का सुख, स्वर्ग से उन्नीस भी नहीं होता। रोटी भी रोज होती है, और प्रायः उस पर मक्खन भी लगता है, कभी कम, कभी ज्यादा। अपने साथ-साथ, अन्य दो वर्गों का पोषण भी, इन्हीं के कन्धों पर होता है । मध्यम वर्ग भी पुकारा जाता है, इन्हें। इनके त्यौहार, घी में तली पूड़ियों, पराठों और व्यंजनों से मनाये जाते हैं। ऐश्वर्य की दहलीज़ पर ! 

और अन्ततः ऐशो-आराम। वैसे तो लोग, मध्यम वर्ग से दहलीज पार कर भी यहाँ आते है, पर प्रायः जन्म यहीं लेते हैं। सब कुछ, सजा सजाया उपलब्ध होता है, काम करना, आवश्यक रूप से, आवश्यक नहीं होता। प्रचुर साधन, सतत उपलब्ध रहते हैं और पेट रहता है भरा-भरा। भूख लगती नहीं तो, स्वाद भी नहीं आता, भले छप्पन तरकारी और छत्तीस अचार सजे हों। त्यौहार की व्यवस्था, हमेशा रहती है, पकवान रोजाना ही बना करते है। और जो रोजाना हो, वह त्यौहार कैसा ? साधन भरपूर, पर सुख, किसी किसी को ही नसीब होता है। जैसे विष-कन्याओं से ब्याह दिये गये हों, सदा अतृप्त। भाग्यवान नजर आते हैं, मगर कोई-कोई इतना अभागा, कि मिसाल ढूँढे ना मिले।

अगली श्रेणी में जाना, उपलब्धि माना जाता है, जीवन का लक्ष्य भी। मगर मुझे लगता है, कर्म योग के चरम तक पहुँचना ही ठीक, ऐश्वर्य के दरवाजे तक। ऐसे पार किया कि परिश्रम दरवाजे पर, पीछे ही रह गया और प्रयासों पर निर्भरता जाती रही। इस कथित उपलब्धि की कीमत, इतनी ज्यादा होगी, कि जीवन बीत जायेगा, चुका ना पाओगे। 

पता  नहीं, आप मेरी बात से राजी हो भी पायेंगे, या नहीं ?

THE QUEUE....