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हलाहल !


तू बच के, भागेगा भी, कहाँ, नामाकूल !

ये तमाशबीन, ये पुलिस, ये कानून, सब, उसी के तो हैं,

तेरे हिस्से, जेल, जलालत, पंखे से फंदा, और अब ड्रम,

और तो और,

ईंट-ईंट बनाया, तेरा अपना ही घर भी, तेरा नहीं, अभागे !

मगर तू तो मर्द है, और मर्द को दर्द कहाँ होता है ? 

काश, ना होता, हिसाब तो ना देना पड़ता,

कोई माँगता भी नीं !

जो, जी ही, ना जा सके, ज़िन्दगी, वही, गुजारनी होती है !

Bye, My friends, So Long !

 

माँ-बाप कहीं नहीं जाते, प्रेमी-प्रेमिका भी कहीं नहीं जाते, दोस्त भी कहीं नहीं जाते, हर वो व्यक्तित्व, जो घनिष्ठ है आपका, कहीं नहीं जाता, तो दोस्त से घनिष्ठ, और कौन ? और ऐसे लोग, आस-पास ना होते हुए भी, आस-पास ही होने की अनुभूति, प्रायः दिया करते हैं, इसमें अनहोनी कैसी ?

मुझे भी, खुद, आप लोगों के साथ ही होने की अनुभूति हुई, तो गलत क्या ? और मै कल्पना को, मूर्त रूप दे सकता था, सो दे डाला। कोई चार-पाँच फेक थे, समय, कुल एक दो घण्टे, इतनी बड़ी साज़िश थी नहीं, जितनी कुछ लोगों को लगी कि, झूठ-मूठ हाजिरी लगवा लेंगे। क्या सचमुच ?

अभिनेता प्राण का, ये बहु-प्रचलित संस्मरण है कि एक आयोजन में, एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें, सरे-आम, खूब बुरा भला ही नहीं कहा, कई थप्पड़ लगा डाले, इसलिए कि किसी फिल्म में, उनके खलनायक की भूमिका से, वो बेहद नाराज चली आ रही थीं । प्राण ने उनके पैर छुए, और ये वक्तव्य उनका, बहुत समय तक, चर्चा में रहा कि, उनके प्रति, उस महिला का यह व्यवहार, यथार्थ में, उनकी अभिनय क्षमताओं की सर्वाधिक मूल्यवान, और महत्वपूर्ण, पहचान और पुरस्कार था।

मेरा भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। 'आया नहीं से-आ नहीं सका' के विवाद से इतर, मेरी विशुद्ध सृजनात्मक कोशिशों से, आहत वही हुए, जिन्होंने इसे सचमुच का मान लिया, और फिर यथार्थ, उनसे सहन नहीं हुआ। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि नाराज, अपने ही होते है, गैरों का, और गैरों से, तो लेना देना भी क्या ? नाराजगी, नजदीकियों का ही, सुबूत हुआ करती हैं।

तो भावनाएं, जिस जिस की भीआहत हुई, गले लग कर क्षमा माँग लेंगे, फेक की नहीं, ना आ पाने की। अगली बार थोड़ी और कोशिश कर के देखेंगे, होगा क्या, कौन जाने, हाथ में है ही, किसके ? खुशी खुशी वापस हों लें, नहीं तो फिर से मिलने, आयेंगे कैसे ! ध्यान रखी, अपना, और अपनों का, और मेरा भी !

🙏👋

किताब, ज़िन्दगी पर !

 

ज़िन्दगी पर, एक किताब लिखेंगे,

उसमें, अपने सारे हिसाब लिखेंगे,

कुछ बदलते हुए, अपनों के लहजे,

कुछ टूटते जा रहे, ख़्वाब लिखेंगे,

जो कभी, किसी से कह नहीं पाए,

वो सारे के सारे, जज़्बात लिखेंगे,


अपने ही ऊपर, 

एक किताब लिखेंगे !

मौसम, और मुहूरत !


Yesterday, was our wedding anniversary, 43rd ! 

Went off, super-smooth, and memorable. Made a commemorative video, that was taken nicely, by and large, Sunder Kand Session, brought 2 Cadbury's, gifted one to her, and requested her to gift, the other one, back to me. She gave me funds, and I returned her shares, purchased, there from.😂

Son penned in, as follows. His literary adventure, impressed us all, though DIL insists, it to be a hidden, or guarded talent. 


पापा की दाढ़ी में सफेदी बढ़ रही है,

मम्मी की शिकायतें भी हर दिन चढ़ रही हैं !

पर सालों बीत गए प्यार वही पुराना,

एक-दूसरे को झेलना, यही है अफसाना !


तो चलो मिलकर, इनको बधाई दें,

शादी के इतने साल, वाह! ताली दें !

खुश रहें, मस्त रहें, झगड़े हों बस हल्के,

क्योंकि, असली रोमांस होता है, नोंक-झोंक के छलके !


शादी की सालगिरह मुबारक हो

Whatever, amazing anyway. Younger sister sings the following, for us, another surprise. A pre-poned Rakhi, I'd say.


Both daughters, currently abroad, profusely missing the occasion, DIL arranged-in super surprise, local delicacies, distance mode. Siddharth, the son in law, the cute quipper, the first complimentor, the initiator. Dhamaal in the evening.

तभी कहता हूँ, मस्त मौसम, मुहूरत के मोहताज, नहीं होते। परमपिता की कृपा, और सौभाग्य की पराकाष्ठा !

अभिभूत 🙏


Happy Anniversary, Sweet-heart !





अर्धांगिनी, दुख-सुख की साथी, को समर्पित ! 💑
 
43 साल, पता ही नहीं चला, कैसे बीत गए 😃
(ऐसा कहा जाता है, वर्ना पता, रोज चलता है, कभी कभी तो, कई कई बार 😂)

पृष्ठभूमि वाचन, ताहिर फराज साहब, साभार 🙏

ps: Feedbacks validate, yet again, that finer prints grab more attention  😂

IMPORTANT:
IT'S A VIDEO UP THERE, CLICK THE THUMBNAIL TO PLAY 😀👍



AD - Acknowledgement Due

शायद, मेरे बचपन की, सबसे पुरानी यादों में शामिल हैं, ये संस्मरण। इतनी पुरानी, कि साथ कौन था, ये भी याद नहीं। था निश्चित, कोई बड़ा, मेरे साथ ही लेटा होता और मैं कहता, कोई कहानी सुनाने के लिए।

वो खुशी खुशी, राजी भी हो जाता, मगर 'हूँकरे' की शर्त के साथ। जो नहीं जानते, हूँकरा, यानी कहानी की हर लाइन के बाद, 'हूँ' की आवाज। टेक्नीकली, ये होता है, एकनौलेज्मेन्ट, यानी संकेत कि बच्चा सो नहीं गया है, जागा है, और कहानी, लाइन दर लाइन, ध्यान से सुन भी रहा है। हूँकरा खतम, बोलें तो बच्चा सो चुका, कोई मतलब नहीं, कहानी का, अब। कहानी भी खतम !

अब बच्चे नहीं रहे हम, मगर प्रासंगिकता अभी भी बनी हुई है। आप किसी के लिए, कुछ भी करते हो ग़र, प्रतिफल मिले, ना भी मिले, पावती जरूरी है, पता तो चले, आपकी कोशिशें पहुँच भी रही हैं, उनका मतलब भी, कुछ तो है। वरना, बच्चा सो चुका मान, कहानी खतम कर देना ही ठीक।

जिन कोशिशों के असर, नज़र नहीं आते, धीरे धीरे हतोत्साहित होती जाती हैं, और फिर खतम। और इसमें गलती, कहानी सुनाने वाले की, कोनी !

Note : The picture here-in, is a composition in fact, show casing me with me, only 👐

गंगा-स्नान और गिलास !

महाकुंभ का पुनीत अवसर, कहा जाता है, 144 साल बाद आया है, ये। आम जीवन में, एक बार भी, आसान कोनी। स्वाभाविक है, उत्सुकता, उत्साह और कामना की सीमा नहीं, सारे कीर्तिमान ध्वस्त होते जा रहे हैं, ना भूतो, ना भविष्यति। इतने श्रद्धालु जन, कि अनेक देशों की मिली जुली जनसंख्या भी, बौनी लगे। व्यवस्था की अपनी समस्याएं भी होती हैं, अपनी चुनौतियाँ।

ऐसी परिस्थितियों में, परिवार-जनों का मन भी हो आया । मेरे लिए तो खैर, अंगूर खट्टे थे, मगर परिवार की इच्छायें पूरी करने के, सामर्थ्य भर, ईमानदार प्रयासों का फर्ज। विभागीय सम्पर्कों पर विचार होने लगा, और सुई जाकर, एक ही व्यक्ति पर, जा जाकर बार बार अटकने लगी, जिसने कोई तीन साल पहले, उत्तर-पुत्री-वैवाहिक गंगा-स्नान की स्मरणीय, बेहतरीन व्यवस्था की थी।

सम्पर्क हुआ तो उसने तत्काल, पहले तो प्रसन्नता व्यक्त की कि उसे याद किया गया, साथ-साथ परिस्थितियों में अन्तर बताते हुए, सम्भावित असुविधाओं और सीमाओं से भी अवगत कराया, अपनी ओर से समस्त प्रयासों के आश्वासन के साथ। करीब-करीब, यही प्रतिक्रिया अन्य तत्कालीन सम्पर्कों की थी।

खैर मन बहुत था, तो अनिश्चितताएं बनी रहीं, हम चले आए। गंगा मैय्या ने ही बुला लिया था तो अनेकानेक, अप्रत्याशित, सहजता और सुविधाएं भी मिलीं, और अन्ततः परम पवित्र, गंगा स्नान का पुण्य लाभ हुआ, आशातीत सहजता के साथ, नाम मात्र की, अपरिहार्य पद यात्रा के साथ।

अपने परिवारजन, साथ थे ही, कुछ आल्हादित, कि इतना कुछ प्राप्त हुआ, जितना सोचा भी नहीं था, ये लोग गिलास में भरा पानी देख रहे थे । कुछ लोग, पिछली बार से तुलना कर रहे थे, तब क्या कुछ हुआ था, और अब नहीं हो पाया, परिस्थितिजन्य अन्तर से इतर, ये गिलास कितना खाली रह गया, देखने वाले लोग।

अपुन ? मस्त, अहो-भाग्य ! कि खाली-भरे से परे, मेरे पास गिलास तो है, अभी भी, यानी इतने अपने लोग, आज भी स्नेह और आदर से ओतप्रोत, और आज, बोलें तो, सेवा-निवृत्ति के कोई सात आठ साल बाद भी। उस दौर में, जब पद छोड़ने के साथ ही, लोग मुँह फेर लिया करते हैं। क्या हुआ, जो व्यक्तिगत, साक्षात न हो सका, मेरा स्नान तो हो गया। मन चंगा, तो कटौती में... गंगा 🙏👐😀

अभिभूत 🙏

#58 सफरनामा !

आजकल फ्लाइट, और आरक्षित एसी से सफर करने वाले लोग भले आसानी से न समझ पायें, कि कभी हमने ही ट्रेन की साधारण बोगी में भी सफर किया है। और खूब किया है, ये कभी-कभार की बात नहीं। कभी कभी तो डिब्बे में घुस पाना ही दूभर होता था, हाथ में दरवाजे का हैण्डिल, और आधा-अधूरा पैर पायदान पर टिका हुआ, और ट्रेन चल पड़ती थी।

एक बार चल पड़ी तो लोग सैटल होते थे, जगहें बनतीं थीं। पहले दरवाजे से अन्दर होने की, और फिर खिसकते हुये गैलरी में आगे बढ़ पाने की। हम सीट पर बैठे लोगों को हसरत भरी नजरों से, और सीटों पर काबिज लोग हमें, आधी तरस, और आधी चिन्ता भरी नजरों से, देखते थे कि आ गये। देर सबेर, एडजस्ट इन्हें भी करना ही पड़ेगा।

वो तलाश, सीट पर टिकने लायक एक कोने की, और सीट पर काबिज बन्दे की उसे कवर किये रहने की, मगर कब तक ? कामयाबी, अन्ततः मिलती ही थी। अगली कवायद, कब्जा मजबूत करने की, और फैलाने की। अगर कोई सवारी उतर जाये तो मुश्किल, एकाएक आसान हो जाती थी, और अगली कोशिश शुरू हो जाती थी, खिड़की वाली सीट तक पहुँचने की।

रफ्ता-रफ्ता खिड़की तक पहुँचना, सामान मनमर्जी सेट करना, और फिर फैल-फूट कर बैठना। सब हो ही जाता था और तब, आप खुद को डिब्बे का बादशाह समझ सकते थे। खिड़की से सबसे अच्छा नजारा, आपको ही दिखता था। खिड़की बन्द रखनी है, या खुली, और कितनी, फैसला आप ही का। नये मुसाफिरों में से किसको, और कितनी जगह देनी है ? और कब ? देनी भी है ? यह सब भी आप पर।

और फिर, वो स्टेशन भी आ जाता है, जहाँ आपको उतरना है । बैठने की जगह, भले कितने मुश्किल हासिल हुई हो, कितना इन्तजार, टुकड़े टुकड़े हासिल राहत। मगर, अब घेरे रखने का कोई कारण नहीं, ना औचित्य, ना सार्थ। और इसके लिये मुसाफ़िरों से, जिन्हें आगे जाना है, गुत्थमगुत्था होने की क्या ही तुक। यादें समेटिये, और उतर जाइये। सफर का यही मतलब है !

अपने हम-उम्र दोस्तों के लिये, इस किस्से में, एक निहितार्थ भी है। यह कहानी, अपने जीवन की ही तो नहीं। दफ्तर के बाॅस हों, या घर की मालकिन, स्टेशन आ गया तो सीट का मोह त्यागिये और घर जाने को सज्ज होइये, यही योग्य !

आपका दिन शुभ हो।

#52 गौरव - बूढ़ा होने का, निर्भर होने का


इस बार, भरपूर समय बच्चों के साथ बिताने का अवसर हो रहा है, मीठी-खट्टी-चटपटी और स्वादहीन, मगर पौष्टिक और स्वास्थ्यप्रद, हर तरह के अनुभव। मैंने देखा कि बच्चे, भले कितने ही नाफरमान दिखते हों, अन्दर ही अन्दर, बेटा अपने बाप, और बेटी अपनी माँ जैसी ही बनने की जुगत में लगी रहती है। अवचेतन में भी। बाहर-बाहर, कभी कभार झुंझलाहट के बावजूद, स्वीकार्यता की अन्तिम और परम कसौटी।


बच्चे, ठीक-ठाक समय साथ रहें तो मां-बाप, अगर भाग्यवान हुये तो, बूढ़े होने लगते हैं। बोलें तो, अवसर ही नहीं मिलता, तो अभ्यास छूट जाता है। कुछ कर पाने की सामर्थ्य, गिरने लगती है, और निर्भरता बढ़ने लगती है। यह उदासी की नहीं, खुश होने की, गर्व करने की बात है। यह दिन, हर किसी को उपलब्ध नहीं होता। किसी-किसी की तो उम्र निकल जाती है, इन्तजार में। जिन्दगी की जरूरी जिम्मेदारियाँ उठाने को, कन्धा तो चाहिए ही। हर किसी को कहाँ होता है कि कन्धा भी हो, और सामर्थ्य भी, बोध भी हो, मन भी , और संकल्प भी।


बुजुर्ग, बूढ़े भी हो सकें, सामाजिक कर्तव्य बोध, और दायित्व से गौरवपूर्ण मुक्ति पा सकें, उस उपाय की डोर का एक सिरा, उनके हाथ भी होता है। जिसे छोड़ना अनिवार्य होता है। कभी देखा है, गुब्बारे का धागा छोड़े बिना, वह आसमान पहुँच पाया हो ?

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 20-06-2021

भलमनसाहत तो यही है कि, आप कायनात को, उससे ज्यादा देकर जायें जितना आपको मिला है, उससे !
आज मेरा दिन है, पिता का दिन, कम से कम बच्चों के लिये तो है ही। बच्चे जिनमें मेरा जीव है, या फिर विचार हैं, या तो फिर दोनों हैं।
माता पिता, भगवान की बनाई वो एफ डी होते हैं, जो आपसे पहले दुनियाँ में आती है । एफ डी, साधन-सुविधाओं की, संस्कारों की, सुरक्षा की और सलीके की। अगर ठीक-ठीक चले तो इसकी ब्याज ही पार उतार देती है, वर्ना तो ख्वाहिशों का कोई ठिकाना तो होता नहीं।
माता पिता, जैसे साइकल के दो पहिये। माता, जैसे आगे वाला पहिया, साफ सुथरा, हमेशा आंखों के सामने, दिशा देता। कीचड़-गड्ढे से बच बचाकर निकल पाने की सुविधा होती है, इसके पास। साइकल पर सवार बच्चे भी, आम तौर पर, इसी पहिये को जानते पहचानते हैं।
पिता, यानी पीछे वाला पहिया। शायद ही कभी नजर जाती हो उस तरफ। उसके लिये आकर्षक दिखने से ज्यादा जरूरी, स्थिरता और मजबूती होती है, हवा बराबर रखनी पड़ती है। रफ्तार बनी रहे, ये इसी के जिम्मे। अपनी-अपनी भूमिकायें। पहिये साथ-साथ घूमते हैं तो जिन्दगी आगे चलती है। साइकिलें आजकल वैसे, फ्रन्ट व्हील ड्रिवन भी खूब दिखतीं हैं, बोथ व्हील ड्रिवन भी, और मोनो व्हील भी 😀
बच्चे पिता बनने लायक हो गये, समझो, खुद एफ डी हो गये। पिछली एफ डी की ना जरूरत, ना संगति, ज्यादा से ज्यादा एक धरोहर। हम यहीं हैं आज। पिता कैसे रहे, इस बहस का हिस्सा हम नहीं। सभी तो, अच्छा करना चाहते हैं। हुआ कितना ? बच्चे जानें, या फिर समाज, या फिर समय।
जो भी किया, कोई उपकार नहीं। कर्तव्य, सबसे पहले स्वयं के प्रति। एक प्रयास उऋण होने का, अपने पूर्वजों से, समाज से, कायनात से। किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं। बच्चे सुखी हैं, सकुशल हैं और समाज को योगदान में सक्षम, इतना बहुत !
🙏
Suman Singh, Dhirendra Singh and 23 others
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 06-06-2021

"आखिर, मैं हूँ कौन ?"
यह दर्शन, या फिर धर्म का कोई भारी-भरकम निहितार्थ वाला, जटिल सा सवाल नहीं है। ये तो मेरी रोज-मर्रा की जिन्दगी मुझसे, हर बार पूछती है, जब भी खड़ा होता हूँ, आइने के सामने।
और अच्छा लगे, या अच्छा ना भी लगे, सच यही है कि भले हम कभी काजू-किशमिश-बादाम ही क्यों ना रहे हों, वैसे कोई दावा नहीं कि हम वाकई कभी थे ही, अगर रहे होते तो भी क्या, आज की तारीख में, गोबर से ज्यादा कुछ नहीं। चन्द यादें, जिन पर मन हो तो घमंड कर लें, और अत्यन्त सीमित प्रासंगिकता, उपयोगिता।
और हमारी जगह, अगर किस्मत अच्छी हुई तो, उपले की शक्ल में दीवार पर लगा दिये जाते हैं, स्मृति चिन्ह की तरह, धीरे-धीरे सूखने के लिये। सूख जायेंगे तो एक किनारे, करीने से रख जायेंगे। तीज-त्यौहार, अज्ञारी सदृश उपयोगार्थ ।
यह आम नियति है, कोई आ गया है, कोई रास्ते में है। बात, केवल तालमेल की है। आज एक्सप्रैस वे के जमाने में, चेतक का भी क्या उपयोग, संगति नहीं है ना । आउटडेट होते देर लगती है क्या ?
और चेतक, भले सदियों में कोई कोई आता हो, एक्सप्रैस वे पर दौड़ने वाली कारें, हर घड़ी इतनी आ रही हैं, हमेशा पहले से बेहतर । और ये भी पलक झपकते, बीती बात हो जाने वाली हैं।
तो साहब, ठीक से जान लें। इसे चाहे तो निराशाजनक कहें, या सच से साक्षात्कार, और स्वीकारने का अपूर्व अवसर ! अगर ठीक से हो गया, तो देखना, हताशा नहीं, हताशा से मुक्ति ही, इन्तजार करती मिलेगी 👍
अनुपूरक:
गोबर, अगर दिमाग में भरा हो तो चिन्ता की बात हो सकती है। मगर खुद, एक दिन गोबर हो सकने की सामर्थ्य प्राप्त होना सौभाग्य की, और सच में हो ही जाना, निश्चित गौरव की बात है।
सामर्थ्य, यानी भगवान ने आपको इतना भरा-पूरा बनाया हो कि आप बांट भी सकें । साहसी और महामना भी, कि दे ही डालें । कभी किसी सूखी लकड़ी, या पाॅलिथीन को गोबर बनते देखा है ? यह परिणति, उसी को उपलब्ध होती है जिसे भगवान का वरदान, खुले हाथों मिला हो।

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 03-06-2021

बहुत लोग, हमसे शिकायत रखते हैं कि हम काम नहीं, काम की सिर्फ बात करते हैं।
काम किये बिना, किसका काम चला है ? काम तो, हम भी करते हैं, वर्ना किस काम के रहेंगे, मगर हमें पता है, कितना काम, कितने काम का है वर्ना काम की भला कोई इन्तहा होती है, और जो काम, काम ही ना आने वाला हो, वो भला किस काम का।
कभी-कभार बिना काम, काम की सिर्फ बातें भी बड़े काम की होती हैं।
है ना, काम की बात ? 😜

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 01-06-2021

1st June ! It's Apporva's Birthday ...My younger angel 😀
Recalling memories, I can't leave Ice cream out. It was, hope it continues to be, her most cherished delicacy. I'll share an incident, to elaborate.
She would have been, just a few years old, when she had her little finger infected. A pus filled boil. Doctor, pretending examination, pressed it hard, and it burst. Excruciating pain, She cried vehemently, the wound was cleaned and dressed up quickly, nevertheless.
Now, the doctor smiled, and spoke to the still crying Apoorva, "What baby ? It's over. No reason to continue crying, now ! "
Then happened the magic. Apoorva, wiped her tears, and was grinning again, ear to ear, the very next moment. I learnt my lesson, "NO POINT, CRYING OVER THE SPILLED MILK. LET'S EXPLORE, IF WE CAN SALVAGE
Doctor was highly impressed, too. He offered a treat, to Apoorva. Checked up, what does she likes most ? Ice cream, came the reply. So, he requested me to go, and get her Ice cream first, prescription and medicines will wait.
When I told him to finish, with prescription, and medicines first, and assured to take the Ice cream along, while returning. He thought, I was trying to evade. I clarified, that a candy won't do. It has to be a brick, family size. He cross checked with Apoorva, "Which Ice cream, do you like to have, beta ?". Apoorva, too young to express in words, replied with gesture, palm facing each other, and a space to accommodate a full Ice cream brick, in between.
Some philosophy. Life is like an Ice cream, too. It's meant to be tasted, relished and shared. No way, to keep it intact, preserve it indefinitely. It'll stink, and render futile, even to the owner.
Shouldn't try to hold, more than necessary. You won't enjoy, but waste most of it. You shouldn't be impatient, either. You might drop it on your lap, or the floor. Wasted, and nuisance to clean up, too. Tastes best, enjoyable most, when you nibble, positive, appropriate, regular, and slow.
If you do nothing, it's going to melt off, anyway. 😜

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 05-09-2020



आज 5 सितम्बर, महामहिम राष्ट्रपति स्वर्गीय डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पूर्व शिक्षक, का जन्मदिन और तदनुसार घोषित शिक्षक दिवस। सभी शिक्षकों को सादर, साभार परम नमन 🙏
शिक्षक, यानी वे महापुरुष, जिनकी शिक्षा से मैं आज जहाँ हूँ, पहुंच सका हूँ, मगर जिनके बावजूद ? और अगर वह भी शिक्षक ही रहे हों, तो उनका क्या ?
शिक्षक एक पद नहीं, एक संकल्प है,अपने ज्ञान,अपनी सकारात्मकता को, किसी उत्सुक को हस्तांतरण कर सकने की, इच्छायुक्त क्षमता का। पद वाछिंत हो सकता है, अनिवार्य नहीं और पर्याप्त भी नहीं । शिक्षक कोई भी हो सकता है, आप की पत्नी भी, प्रायः होती भी है !
शिक्षक की योग्यता क्या होनी चाहिए, कोई मापदण्ड नहीं । देने वाले के पास, कुछ ना कुछ देने लायक हो, और लेने वाले के पास इच्छा हो, यह सम्बन्ध रिवर्सिबिल भी हो सकता है। अन्तर जितना कम हो, हस्तांतरण उतना ही सहज और आन्नददायक । नहाने में जितना अच्छा, कम गहरी नदी में आता है, समन्दर में कहाँ ?
समन्दर से याद आया, विद्यादान में शिक्षक के पास ज्ञान का भंडार कितना है, अधिक महत्व उस ज्ञान के प्रति उत्सुकता जगाने, बनाये रखने और अन्ततः उसे हस्तांतरित कर पाने की योग्यता का होता है। विद्वान आवश्यक रूप से, अच्छे शिक्षक नहीं होते।
शिक्षक के लिये, ज्ञानार्थी के प्रति संवेदनशील होना कम महत्वपूर्ण नहीं है । विद्यार्थी की कठिनाइयों को शिक्षक सही सही अनुभव कर सके तो ही उपयुक्त। जो अपनी शिक्षा अटक अटक पाये हों, शिक्षक अक्सर कमाल के पाये जाते है।
शिक्षक कोई भी हो सकता है, पद और उपाधि के बिना भी, और इसकी आवश्यकता जीवन पर्यंत रहती है ! तो शिक्षक और उनके प्रति आदर भाव चिरंजीवी होता है।
शिक्षक की पदवी, किसी का अधिकार नहीं, उसी के छात्र द्वारा प्रदत्त पुरस्कार है, काश, सभी इतना समझ सकें 😃

THE QUEUE....