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धार्मिक और धर्मान्ध !


मैं, धर्म-विरोधी, कतई नहीं !

मैं आस्तिकों से अधिक आस्तिक, और धार्मिकों से अधिक धार्मिक हूँ, और हृदय से चाहता हूँ कि धर्म, अपनी प्राचीन ऊँचाइयों, और गौरव को, पुनः प्राप्त करे, इसके लिए, हम सभी, हर सम्भव उपाय करें।

मगर सबसे पहले, पतन हुआ कैसे ? इन कारणों को पहचानें, और सुनिश्चित करें कि पुनरावृत्ति, होने ना पाये। वो कहते हैं, ना ? मरहम पट्टी तो ठीक, मगर तुमने, जूते से वो कील तो निकाल दी ना ? जिसने ये घाव किया ?

प्रमुखतम कारण, जो मुझे लगता है, कि धर्म-सम्मत आचरण, और अनुसरण की जगह, हमने प्रचार और प्रदर्शन को वरीयता दी, शायद इसलिए कि, अनुयायी, अधिकाधिक हो सकें। धर्म तो, व्यक्तिगत विषय है, अतः व्यापक प्रक्षेपण के लक्ष्य, राजनीतिक ही रहे होंगे, या व्यावसायिक। प्राप्त जन-शक्ति, जिसमें धन-बल, और बाहु-बल भी सम्मिलित है, का दुरुपयोग, प्रभुत्व, और ऐश्वर्य जैसे, निजी लाभों के लिए, किया गया।

इस तरह, धर्म उपेक्षित होता गया, और उससे पोषित सत्ताधीश, शक्तिशाली। परिस्थितियाँ, जब भी विषम हुईं, सत्ता को बचा लिया, धर्म को छोड़ दिया, उसके हाल पर। यह अलग बात, कि जब पोषण ही ना रहा, तो पोषित भी, आखिर कब तक चलता ? कालान्तर में, सत्ता भी जाती रही।

आज भी, क्या आप निश्चिंत हैं, कि सारी गतिविधियाँ धर्मार्थ हैं, या धर्म, केवल माध्यम है, लक्ष्य, कुछ और ही है ? जिस तरह, सारा प्रयास, येन-केन-प्रकारेण, अनुयायी बढ़ाने, और असहमतों को निपटाने पर है, सदाशय, लगता तो नहीं ।

एक बात और, धर्म, केवल पूजा-पद्धति नहीं, उसे समाहित करते हुए, बहुत व्यापक बात है। आपके प्रयास, अगर सब जानते बूझते हैं, तो आप अनैतिक हैं, और अनजाने में हैं, आप नादान भी हैं। उन्माद फैलाने की प्रतीत कुचेष्टा, रणनीतिक तो हो सकती है, धार्मिक, कतई नहीं।

पहलगाम की, हृदयविदारक घटनाओं से, मर्माहत ! 🙏

सर्वमंगल मांगल्ये !


 सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्य भिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु छाया-रुपेण संस्थिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू क्षान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू जाति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू लज्जा-रुपेण संस्थिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषू कान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु व्रती-रुपेणना संस्थिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु स्मृती-रुपेण संस्थिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु भ्राँति-रूपेण संस्थिता | नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

इन्द्रियाणा मधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या | भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ||

चितिरुपेण या कृत्स्नम एतत व्याप्य स्थितः जगत, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

🙏

Happy Retirement, Harnath !


नौकरी, जैसे हवाई जहाज़ का सफर। टेक ऑफ कभी भी किया हो, कहीं से भी किया हो, दूरी कितनी ही  रही हो, ऊँचाई कोई भी पकड़ ली हो, मौसम ख्रराब भी हुआ ही होगा कभी-कभार तो, डरावना टर्बुलेन्स, सीट बैल्ट, अब लगाओ, अब खोल सकते हो, सार किसी का, अब कोई भी नी।


सार है तो इतना कि लैण्ड, हर फ्लाइट होती है, एक ना एक दिन, देर-सबेर बात अलग । खुशकिस्मत हैं कि लैण्डिंग सेफ हुई है, हैप्पी हुई है। इतने सारे लोग रिसीव करने आये हैं, सी ऑफ करने भी। अब वक्त, घर लौटने का है, अपनी मर्जी की ज़िन्दगी जीने का है। सफर का कचरा, साथ ले जाने का नी। शुक्रिया उसका, जिसने सहूलियतें दी, सफर खुशनुमा और आसान बनाया, उसका भी जो मुश्किलों का सबब बना, और आपको सबक दे गया, मजबूत और समझदार बना गया।


सफर के गिले-शिकवे-शिकायत होंगे तो, मगर सब कचरा है, साथ ले भी जाना, काए को ? अच्छी यादें, कीमती अनुभव, जगह-जगह खरीदा हुआ, पसन्दीदा सामान, सुनहरे सपने, यही सब साथ ले जाने लायक है। घर सजाइये, संवारिये, और आराम से रहने लायक बनाइये, बनाये रहिये, और भूलिए मत, कि उस घर में, आप ख़ुद भी आते हैं 


तो ढेर बधाइयाँ, सारी शुभकामनायें, आशीर्वाद !

और हार्दिक स्वागत, "ठलुआ क्लब" में !  😀👍

कल से, नई सुबह, नया दिन, नया संवत्सर, नया जीवन, मतलब नई जीवन शैली !

So sorry, my dear Thomso's 1980 !

 


तमाम हाथ-पैर मारने के बावज़ूद, पहुँच ना पाने के लिए, हार्दिक खेद सहित, समर्पित, वर्तमान में, IIT Roorkee वर्ष 1980 में उपाधित सभी, सहपाठी तो थे, तब थे, अब दिल के टुकड़ों को, उन सबकी ओर से भी, जो विभिन्न अपरिहार्य, और बाध्यकारी कारणों से, आज 16 मार्च, 2025 से आरम्भ, पुनर्मिलन समारोह में, प्रतिभाग न कर सके, अपने विद्या मन्दिर से, भेंट ना कर सके ।

जो, एक बार आया यहाँ, यहीं का होकर रह गया। स्नेह, और अपनेपन, और कृतज्ञता का, ये बन्धन, इस जनम तो, छूटने से रहा। अच्छे से पता है कि, यह सुअवसर, अब जीवन-भर, शायद ही आ सके, कहाँ से नहीं आ रहे होंगे, मिलेंगे, एक जमाने के बाद, फिर भी ना आ पाना ? परिस्थितियाँ निश्चित ही, असाधारण ही रही होंगी, आप ही नहीं समझेंगे तो फिर, कोई भी नहीं समझ पायेगा।

अस्तु, क्षमायाचना, एक बार फिर से। ना सही सशरीर, मन से, हम आपके आस-पास ही विचरते मिलेंगे। तलाश करेंगे, तो दिख भी जायेंगे, नि:सन्देह ! दिल में जरूर चैक करियेगा, वहाँ नहीं मिले, तो फिर कहीं नहीं मिलने वाले। आ सके होते, तो भी नहीं मिलते।

सबको ढेर सारा प्यार, भगवान करे, आयोजन सफल हो, खूब धमाल हो, पुरानी सब यादें, एक बार फिर से, जिन्दा हो उठें। शुभकामनाएं 👍

ऐश करो, यारो 👍 तस्वीरें लेना, और शेयर करना, भूलना मत ☝️

"कुछ तो मजबूरियाँ, रही होंगी, यूँ कोई, बेवफा नहीं होता !"

Happy International Women's Day !

 


"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:"

अर्थात्, जहाँ नारियों की पूजा की जाती है, वहाँ देवता रमते हैं। अर्थात् देवता वहीं रमते हैं, जहाँ नारियों की पूजा की जाती है।

नि:सन्देह, बराबर है, सौ फ़ीसदी बराबर है। वहीं रम ही सकते हैं, वरना पूजा-अर्चना, थोड़ी-बहुत देर के लिए, ना सही बन्द, पाॅज़ करके ही देख लो। अरे, देवताओं को छोड़ो, आप ख़ुद नहीं टिक पाओगे !

आजमा भी सकते हो, जान-जोख़िम, सब आपका।

Joking ! ...I was, just joking !!

HAPPY WOMEN'S DAY !!!

मज़ाक अपनी जगह, सीरियसली बराबरी के दावों, और कोशिशों के इस दौर में, इतना समझने जैसा है कि दोनों ही, अतुलनीय हैं, इसलिए कि शारीरिक, और मानसिक रूप से, बिल्कुल अलग-अलग हैं, और ये, स्वयं, सृष्टा की योजना है, हमारी, या आपकी, इसमें कोई भूमिका नहीं।

दोनों ही अधूरे बने तो हैं, परन्तु सृजित हैं, अनुपूरक, यानी अगर चाहें तो, एक दूसरे को, पूरा भी कर सकते हैं। प्रतिस्पर्धा की तो, बात ही, मूर्खतापूर्ण, बेतुकी और सारहीन है।

उदाहरण के लिए, स्त्रियाँ दिल पर, निर्भर अधिक करती हैं, पुरुष दिमाग़ पर। ऐसा शायद सांसारिक भूमिकाओं के अनुरूप है। स्त्रियाँ सोचा भी, दिल से करती हैं तो पुरुष, प्यार भी दिमाग़ से ही, किया करते हैं।

दोनों सहारा बनें, एक दूजे का तो, दोनों का ही काम, बन भी सकता है। सोचने का सारा दारोमदार दिमाग पर आ जाये, और प्रेम का दिल पर। आवश्यकता है तो नहीं कहने की कि, यह सुखद परिणति हुई, परमपिता के आशयानुकूल !

अहं को इतना निरीह, और कमज़ोर भी ना समझा जाये। अगर अड़े ही रहे, प्रतिस्पर्धा, और बराबरी पर, जो आंशिक ही सही, कुछ काम तो ऐसे भी होंगे ही, जो, नैसर्गिक प्राविधानों के विपरीत होंगे। जबरदस्ती भी होगी, असहजता भी और अचीवमेंट, अधिक से अधिक, काम चलाऊ !

मर्जी आपकी, आख़िर जीवन है, आपका ही ना ?

पुनश्च: नारी का लक्ष्य वही, ना हो जो पुरुष कर लेते हैं, वह हो जो, पुरुष करना तो दूर, सोच भी ना पाएं 👍

बसंत पंचमी !


सभी सुधिजनों को, बसंत-पंचमी के पुण्य पर्व पर, सद्भावपूर्ण मंगलमय शुभकामनायें ! 

यह मान्यता भी, प्रासंगिक है कि बसंत पंचमी के दिन ही, माँ सरस्वती का जन्म भी हुआ था। इसीलिए, इस दिन को विद्या जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के बाद, जब शांत वातावरण देखा, तो उन्होंने माँ सरस्वती को प्रकट किया। माँ सरस्वती ने अपनी वीणा से संसार को ध्वनि और वाणी दी।

तीर्थराज प्रयाग त्रिवेणी पर भी, माँ गंगा, माँ यमुना के साथ-साथ माँ सरस्वती भी, रही आती रही है। यहीं से त्रिवेणी नाम आता है। कोई कोई यह भी कहता है कि माँ सरस्वती, अब लुप्त हो गई हैं।

विश्वास यह भी है कि माँ गंगा से जीवन में शक्ति और ऊर्जा आती है तो माँ यमुना से, इनका नियन्त्रण। रजो गुण, तमो गुण और सतो गुण, माँ सरस्वती से। समझें, इंजन-एक्सीलेरेटर, गियर-ब्रेक और स्टीयरिंग सदृश:। नीर-क्षीर विवेक के सहारे, संतुलन की भूमिका, माँ सरस्वती की।

आज का समय, रजोगुण, तमोगुण की प्रधानता का है, विवेक की उपेक्षा का चलन है। उपेक्षित पक्ष, धीरे धीरे अप्रासंगिक हो कर, लुप्त हो ही जाता है, पता नहीं, माँ सरस्वती के विलुप्त होने में, यह विचार, कितना सटीक है ?

आज के विशेष पुनीत दिन, आइये, उत्सव तो मनायें ही, धूम-धाम से, बुद्धि विवेक की देवी, माँ सरस्वती का आव्हान, और पुनर्स्थापना के लिए भी, उत्सुक, जागृत और आतुर हों।  


Happy Republic Day !


आज गणतंत्र दिवस है, एक दूसरे की तरफ से, और सबकी तरफ से, सभी को बधाई, और शुभकामनायें भी !👏👏👏👍

गणतन्त्र दिवस, यानी खुद अपना ही बनाया संविधान, अपने ही ऊपर लागू करने का, संकल्प लेने का दिन। संविधान बोलें तो, सामाजिक मर्यादाओं का संकलन। क्या करना है, क्या नहीं करना है, का अभिलेख। आपके अधिकार, मगर उनसे पहले, आपके कर्तव्यों का लेखा जोखा।

मर्यादाओं के बिना कोई समाज, एक दिन भी नहीं चलता । ये रोकती नहीं, नियंत्रित करती हैं, उड़ती हुई पतंग की डोरी की तरह। इससे मुक्ति की कोशिश, आत्म हत्या से, किसी तरह भी  कम नहीं। डोरी खोल दी जाये, तो पंतग, आसमान नहीं छुआ करती, जमीन पर आ गिरती है, पलक झपकते।

एक अपेक्षा, हम सभी यह बात समझें, सोचें और अनुसरण भी करें। आज के दिन, भारत की जय, बोलते तो हर साल आये हैं, इस बार कुछ अलग कर के देखें । भारत की जय, बोलने के साथ-साथ, थोड़ी-बहुत, करें भी, अपने सक्रिय योगदान के माध्यम से। शुरुआत, भले छोटी सी हो मगर, ईमानदार हो, मजबूत हो।

जय हिन्द ! 

Happy Birthday, 75th !


23 जनवरी 1950, समय सुबह कोई 5 बजकर 20 मिनट, सूरज भी बाद में ही उगा होगा, जब दीदी, इस नश्वर संसार में, अवतरित हुईं।
वैसे, ये आँखों देखी नहीं है, मैं मौजूद, थोड़े ही था। दीदी ने, खुद बताया था, पंडित जी को, और पंडित जी ने, मुस्कराते हुए कहा था, "अगर आप बीस मिनट, केवल बीस मिनट, और इन्तजार कर लेतीं तो, ग्रहों की ब्रांड न्यू दशा में, विराजतीं। मगर यहाँ आने-जाने पर, किसका ही बस ?
मैं ख़ुद आया, कोई साढ़े सात साल बाद। सान्निध्य नापें तो कोई, सिक्सटी सिक्स एन्ड ए हॉफ साल (आज के बच्चे भी समझ लें, इसलिए ), शायद सबसे ज्यादा। विशेषाधिकार भी बनता है, उत्तरदायित्व भी, कुछ ऐसा भी, कह लेने का, जो किसी और के, बस की बात नहीं।
बड़ी बहन, आधी माँ, कही जाती है। माँ बोलें तो, कान पकड़ने का अधिकार, आपके भले-बुरे, हित-अहित के विचार का अधिकार, लाड़-प्यार के साथ, टोका-टाकी का भी, नाराजगी का भी। मगर, महत्वपूर्ण ये भी, कि बच्चे, कम देखभाल से ही नहीं, अत्यधिक देखभाल से भी, खूब परेशान होते हैं, ख़ासकर आजकल।
वापस, दीदी के बचपन में चलें, तो दीदी पीढ़ी की अगुआ थीं, सबसे बड़ी। दादी से दबंगई आई, प्रिंसिपल, तीसरी कक्षा में एडमीशन करने को राजी नहीं हुआ, तो दादी ने, अपने गाँव के स्कूल में, सीधे पाँचवी में, करा दिया। पाँच का एक्जाम, बड़ा एक्जाम होता था उन दिनों, बोर्ड कराता था, दूर-दराज, किसी सेन्टर पर, अनेक स्कूलों के छात्र, और दीदी ने सेन्टर ही टॉप कर डाला। यह पहचान जो बनी, शादी के बाद तक भी, साथ-साथ चली।
पढ़ाई को प्रोत्साहन, संसाधनों, और समर्थन की कमी, ना मायके में रही, ना ससुराल में। फिर नौकरी भी चुनी, तो टीचर की। यानी एक तो करेला था ही, नीम पर और चढ़ गया। माना, जूस हैल्दी होता है, मगर जो पिये, वही जाने। और पिलाने वाले का दिल तो, भरता ही नहीं, पिलाता ही जाता है, मोर ही मोर !
दीदी की ससुराल, रूढ़िवादी सोच की थी। जीजाजी की सुदूर तैनाती, उनके व्यापक सामाजिक दायित्व, प्रायः स्वतः आमंत्रित, ऊपर से, और फिर, असमय निधन। पूरा परिवार दीदी ने, अकेले, परिस्थितियों से जूझते हुये, संभाला। सभी बच्चों के शादी-ब्याह, और सैटिलमेन्ट, उन्हीं का संघर्ष का परिणाम। मायके में भी, जरूरत के समय, उन्हें बुलाने की, या ढूंढने की नौबत, कभी नहीं आई।
समीक्षा, जितनी आसान होती है, सम्पादन उतना ही मुश्किल। कुछ कमियाँ भी निश्चित ही मिलेगी, पर वे उन्हें कोई अपराधी नहीं, आम, सामान्य इन्सान ही बनाती हैं, जो गलत हो सकने का, कल कोई क्या कहेगा, का भी जोखिम उठाते हुए, साहसिक फैसले तो लेता ही है, उन पर चलने की हर-मुमकिन कोशिश भी करता है। गलती भी हो सकती है, इन्सान, हो ही नहीं सकती तो फ़रिश्ता।
अब तो 75 साल, किनारा नजदीक ही है। फर्ज की नदी, अब भी बहती ही जा रही है, मगर वक्त के साथ, रफ़्तार कम हो ही जाती है। एक और ख़ास बात, तली ऊँची हो जाये तो नदी आगे नहीं जाती, वापस लौट लेती है। बोलें तो, बच्चों की सामर्थ्य, ग़र आपसे अधिक हो तो समझो तली ऊपर हो गई। देखभाल, अब आप, बच्चों की नहीं, बच्चे, आपकी करेंगे।
समझो, गाड़ी के नाव पर आने का समय आ गया। गाड़ी, अब भी हाथ-पैर मारेगी तो नाव का संतुलन ही बिगाड़ेगी। यह नियम कुदरत का है, शाश्वत है, परे इससे, कोई नहीं।
मगर माँ का दिल है, और दो-तिहाई जीवन की आदत, इतना आसान नहीं है। शरीर साथ ना दे पाये, तो भी। फिर फ्रस्ट्रेशन, और क्रोध, और सब गुड़-गोबर। ऐसी ऐसी बातें मुँह से निकल जातीं हैं कि याद करो तो ख़ुद को शर्म आये। सारी साॅरियाँ, और पुचकार, समझो बैन्ड एड की तरह, घाव ढक तो लेती हैं, भर नहीं सकतीं। रिसता ही, टीसता ही रहता है, अन्दर ही अन्दर, कभी कभी ज़िन्दगी भर।
करें क्या ? हर बूढ़े की, यही बीमारी है, और लाइलाज है। और जो भी लाइलाज है, उससे लड़ने का फायदा कोनी, स्वीकारने में ही भलाई। यह समय, वानप्रस्थ का है। प्रभु से जान पहचान बढ़ाइये, आगे काम आयेगी, आख़िर में, वहीं तो जाना है। बच्चों को जरूरत हो, वो ख़ुद माँगे तो ही, सलाह दीजिये, केवल सलाह, फैसले नहीं। उनके सामर्थ्य पर, विवेक पर भरोसा रखिये और याद ये भी रखिये,
"जलो वहीं, और तब, जब वाकई जरूरत हो,
दिन के उजाले में, चरागों के मायने नहीं होते !"
उपरोक्त सम्बोधन का पूर्वार्ध, तो मेरा ही है, अर्धांगिनी को कैसे ही मालूम होगा। मगर उत्तरार्ध में भी, भाभियाँ, अपनी तरफ, अभी भी ननद पर, सीधे बोलने से बचना पसन्द करती हैं, परन्तु जो भी मैंने कहा, विरोध उसका कहीं कोई नहीं। तो, वक्तव्य हम दोनों का ही माने जाने में, जोखिम कोई ख़ास नहीं।
जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाइयाँ ! आप सौ साल जियें, स्वस्थ जियें और सानन्द जियें। बच्चों पर, हम लोग भी उन्हीं में आते हैं, प्यार और आशीर्वाद बरसाती रहें। और रोशन तभी हों, जब लाइट चली जाये, और लाइट कभी ना जाये, भगवान करे !

Absolutely delighted to resume !


 After more than a year, I return, with an intent to stay here only, and wind up everywhere, else. Some favorites will be brought in, and fresh blooming will happen, right here, now on.

#62 The Day of Retirement

 समधी साहब, आज (31-03-2023) सेवा निवृत्त हो गये।



नौकरी, ख़ासकर सरकारी, जैसे हवाई जहाज़ का सफर। टेक ऑफ कभी भी किया हो, कहीं से भी किया हो, दूरी कितनी ही रही हो, ऊँचाई कोई भी पकड़ ली हो, मौसम ख्रराब भी हुआ ही होगा कभी-कभार तो, डरावना टर्बुलेन्स, सीट बैल्ट, अब लगाओ, अब खोल सकते हो, सार किसी का, अब कोई भी नी।

सार है तो इतना कि लैण्ड, हर फ्लाइट होती है, एक ना एक दिन, देर-सबेर बात अलग । खुशकिस्मत हैं कि लैण्डिंग सेफ हुई है, हैप्पी हुई है। इतने सारे लोग रिसीव करने आये हैं, सी ऑफ करने भी। अब वक्त, घर लौटने का है, अपनी मर्जी की ज़िन्दगी जीने का है। सफर का कचरा, साथ ले जाने का नी। शुक्रिया उसका, जिसने सहूलियतें दी, सफर खुशनुमा और आसान बनाया, उसका भी जो मुश्किलों का सबब बना, और आपको सबक दे गया, मजबूत और समझदार बना गया।

सफर के गिले-शिकवे-शिकायत होंगे तो, मगर सब कचरा है, साथ ले भी जाना, काए को ? अच्छी यादें, कीमती अनुभव, जगह-जगह खरीदा हुआ, पसन्दीदा सामान, सुनहरे सपने, यही सब साथ ले जाने लायक है। घर सजाइये, संवारिये, और आराम से रहने लायक बनाइये, बनाये रहिये, और भूलिए मत, कि उस घर में, आप ख़ुद भी आते हैं

तो ढेर बधाइयाँ, सारी शुभकामनायें और हार्दिक स्वागत,

"ठलुआ क्लब" में ! 😀👍

#61 रूबरू, एक अर्से बाद 😀

'मुुर्शिद', हमारे साथ, बड़ा हादसा हुआ, हम रह गये, हमारा, ज़माना चला गया !


आभार, उद्धृत पंक्ति, और छायाचित्र के लिये, उनके स्वामियों के 🙏
ये तो है, आपकी शक्ति, आपकी क्षमता, आपकी सुपीरियरिटी पहले जैसी नहीं रही, आपकी ईगो को मिलने वाला दाना पानी कम हो गया, मगर सिर्फ आपका ही नहीं, सभी का, हर किसी का, ज़माना, एक ना एक दिन तो, जाता ही जाता है। किसी का, पहले ही चला गया था, किसी का जाने को तैयार बैठा है, और किसी के पास टाइम, अभी बाकी है, मगर जाना हर किसी का तय है, निश्चित है। देर-सबेर तो हो सकती है, मगर छूटेगा कोई नी, ना तो कोई स्कोप ही है।
आइये, ठीक से समझते हैं।
एक तो ये, कि 'इन्सान' नाम की, जो बेहद काॅम्लीकेटेड मशीन है ना, उसे बनाने की टेक्नीक, यहाँ तो किसी के पास है नहीं, और जहां कहीं, जिसके भी पास है, मोनोपोली है उसकी, उसे जिस भी नाम से पुकारें, डिलीवरी उसी की मर्जी से, उसी के तय समय पर और इस पर, निगोशियेट नहीं कर सकते आप। केवल दरवाजा, खटखटाते, रह सकते हैं। डिलीवरी अनपेक्षित भी हो जाया करती है, कभी-कभार, वैसे ।
ये मशीन आती है, इनबिल्ट लाइफ-लाॅन्ग बैट्री के साथ। चार्ज ये, रोजाना की रोजाना करनी पड़ती है, मगर रिप्लेसमेंट का कोई प्रोविजन नहीं। शुरू का रनिंग इन, मेरा तो विश्वास है, अधिकतम छः सात साल, कानून कहता है 18 साल, फिर कोई चालीस एक साल ठीक-ठाक। उसके बाद तो, प्राब्लम दर प्राब्लम, और ये प्राब्लम बढ़ती ही जाती हैं। बैट्री, अव्वल तो चार्ज पकड़ती ही नहीं, पकड़ ले भी, तो होल्ड नहीं करती। अन्ततः डिस्चार्ज, और फिर स्क्रैप, मतलब जिसका, कोई है ही नहीं !
यह व्यवस्था सतत, सनातन, और एक समान है, पीढ़ी दर पीढ़ी, अन्तर कोई नहीं, चाहे आपके पुरखे हों, या वंशज। मशीनें आकार-प्रकार में, प्रायः एक जैसी ही हुआ करती हैं, और उपयोगी जीवन काल सीमित। जो काम किया करती हैं, या कर सकती हैं वह बदलता रहता है, अलबत्ता, या ऐसा लगता है, बा-वजह कि संसाधन, सुविधायें बेहतर, और बेहतर होती जाती हैं, हम तरक्की कर रहे हैं, इवोल्व हो रहे हैं ना ?
जैसे, अपने पिता को याद करें तो, उन्हें शिक्षा दीक्षा के लिये, पैदल जाना होता था, हमें साइकल उपलब्ध हुई, और बेटे को मोटर साइकिल, उसके बेटे को, शायद कार। संसाधन बेहतर हों तो, जिन्दगी आसान होती जाती है, क्षमतायें बढ़ती जाती हैं। अन्तर यही है, अन्दर खाते, ख़ास कोई नहीं।
तुलना करना, जरूरी ही हो तो मैदान एक सा होना, अनिवार्य है । मेरे एक शिक्षक थे, वजन कोई अस्सी किलो, जबकि हमारा कोई पचास। स्वाभाविक है, उनमें फुर्ती कम पड़ती थी, जल्दी थकने लगते थे। हम उपहास करते तो, वह कहते, तीस किलो वजन, लाद लो पीठ पर, फिर बताना। उनकी बात, अब याद भी आती है, समझ भी, और यही समझना जरूरी भी है।
हममें से कितने ही हैं जिन्होंने पढ़ाई के समय, रिकॉर्ड तोड़ नम्बर प्राप्त किये थे, तहलका मचाया था, पर आज के दौर से तुलना करें तो नई पीढ़ी को, इतने नम्बर, उपहास के लायक ही लगते हैं। मोटर साइकिल चला रहे हैं ना, साइकिल चलाने वाले की कोशिश, समर्पण और परिश्रम कैसे समझ पायेंगे ? आपको भी, इसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । खेल का मैदान, एकसार जो नहीं है।
वक्त वक्त की बात है, मौसम बिल्कुल बदल चुका है। ऊपर से आपकी बैट्री पुरानी हो चुकी है, और नई पीढ़ी की टिप टाॅप। तुलना युक्तियुक्त है ही नहीं, साथ-साथ, चल नहीं पाओगे, तो क्या हुआ ? माँ-बाप, हर जमाने में, खुद अपने पैर जमा कर ही, अपनी सन्तान को आगे भेजते आये हैं। ये बात त्याग की है, उपकार की है, गौरव की है, फर्ज की है, शर्म की नहीं । अब अगर... अगर आपकी यही सन्तान, पीछे मुड़कर, देखना भी गवारा ना करे, तो ये बात कृतघ्नता की, शर्म की, कम से कम, आपके लिये तो, कतई नहीं ?

वैसे बच्चे फर्माबदार हों, बेइन्तहा प्यार करते हों, छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते हों तो भी क्या ? आप अजर-अमर तो होने से रहे ? मंजिल भी, और रास्ते भी, सब पहले से तय हैं, शायद वक्त भी। बाकी सब तो, समझाना है मन का। काम की बात इतनी सी है कि आपका ध्यान जरूरतों पर ही हो, ये कम से कम हों, जितना भी अफोर्ड कर सकें, आकर्षण कम हो जाये, तो भी चलेगा । आपकी जरूरतें, घर की बात होती हैं, ये हालात देखकर थोड़ा-बहुत एडजस्ट भी कर लेतीं हैं। ख्वाहिशें बाजारू, बन सँवर कर आती हैं, बला की कशिश, मगर इन्तहा इनकी कोई नहीं, ये कभी पूरी नहीं होतीं।
कुल मिलाकर, घर वापसी का कोई कन्ट्रोल, आपके हाथ में, है ही नहीं, और जो हाथ में ही नहीं, वो दिमाग में क्या रखना, और काए को ? जाना है, इतना पक्का है, कब जाना है, कैसे जाना है, आराम से, या संघर्ष करते हुये, कौन जाने ? और सबकी दशा एक, अमीर हो, पहलवान हो, लोकप्रिय नेता हो, बड़े से बड़ा अफसर हो, चलती यहाँ किसी की नहीं। फिर डर कर ही, क्या हासिल ? जियो ऐसे कि कभी जाना ही नहीं, सज्ज इतने कि अगले ही पल भी, गिला कोनी।

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।"

अर्थात्‌, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर, दूसरे नये वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा, पुराने शरीरों को त्याग कर, दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।
इस परम सत्य को, स्वीकार कर लेना ही, बुद्धिमानी । करो, या ना भी करो, जाने की प्रक्रिया पर असर, राई रत्ती नहीं। स्वीकार कर लोगे, राजी रहोगे, सज्ज रहोगे तो दर्द थोड़ा कम हो जायेगा, अफसोस भी, और गिला शिकवा-शिकायत भी।

अब मर्जी आपकी ! 😀👍

# 59 एक दिन - ख़ासमख़ास !


It's a special day today. It's the auspicious day of Goberdhan pujan, pratipada, the first day of native financial year, and it's Deeksha's day, her BIRTHDAY 👆

Deeksha bolen to, our fourth kid, an add-on, later in life. I won't call her different, may be promptly mis-interpreted. So I call her special. Born, brought up, and evolved in a set up, alien to us. An experience, so well-worth waiting. 

They say, liking something, in someone is light-weight, easy and pleasant. Disliking is not. One should wait, try to know, understand more and get really sure, before announcing the negative verdict. 

My perception is, Deeksha is cute, charming, jovial, caring, knowledgeable, hard-working, energetic, enthusiastic, confidence packed, a meticulous planner, an apt manager and a determined acomplisher. She won't let you, escape easy.

A qualified IT engineer, temperamental manager, and a foodie by aptitude, knows well, how to create and how to express. Seen 'Live.Eat.Travel' ? Delicacy, that melts as touched, but spreads to each nook and corner of you, in no time. Love it, or hate it, but can't ignore it type. Not sure of anything, to add otherwise. 

A lucky, priceless package, that we are so pleased, fortunate to have. A day of rejoice, celebrations, indeed. 

We wish Deeksha "a very happy birthday !", indeed, and we mean it. 

So May you have wonderful... wonderful days ahead. May all your dreams, the sensible ones, come true. May you keep smiling, always. May the God keep you blessed, as we do now ✋

Enjoy !


Happy Engineer's day ! (belated)

I was penning it for 15th. The ‘Engineer’s day’, so it’s a delayed delivery, in fact.

But, why are we called 'Engineers'? 

Is it from 'Engine'? Steam engines were made only in the 19th century, whereas, engineering as a profession, came in to existence  centuries before. 

The word 'Engineer' has nothing to do with the word engine. ‘Engineer’ did not originate in engine. The word engineer originated from 'ingenium' which is a Latin word, meaning ingenious, meaning someone, who solves problems that elude normal persons. 

From 'ingenium' came 'ingenieur'  ( which is the French word for engineer even now) and from it came the English word Engineer. 

So, an engineer is not just a warehouse of technical information, stocked in mind, and in hand, during his association with some formal institute. Temperament is of paramount importance. 

Relevant education reinforces the asset, polishes it. A career provides you avenues to practice, attempt converting, hypothetical ideas into real manifestations on the ground. Stocking back, and refine, and dedicate it to the final beneficiary, the common man of the society.

Engineering is not just an education, or training. It's a carefully nurtured mindset. A mindset, that's a keen observer, sharp analyst, ingenious solution seeker, persistent translator of ideas into real solutions, meticulous planner, persistent executioner to finish them to as close to perfection as possible. 

That's an Engineer. With, or without, a formal degree. You may find a brilliant one, in a common mason, or carpenter alike and fail to find one, even in a gold medalist degree holder. No wonder, about one third of my institute-mates, have ventured into non engineering fields, and have delivered exceptionally well. 

The application may vary, the brilliance stays. 

Happy Engineers day !

It's my Birthday Today !


 आज, मैं 64 का हो गया।

वैसे कभी 14 का भी था। जन्म चांदी नहीं, पीतल की ही चम्मच के साथ हुआ था, मगर चम्मच थी साफ सुथरी, और मजबूत। अभाव कोई नहीं, मगर पैसे की कीमत पता रहती थी।

अपना खुद का, जीवन देखूँ तो, भगवान का आशीर्वाद, खुल कर बरसा है। यूँ अपार जैसा तो कुछ भी नहीं, मगर कोई अरमान अधूरा रहा हो, ऐसा भी नहीं। और आसानी से मिला हो, ऐसा भी नहीं। अच्छा ही है, इससे कीमत बनी रहती है। गलतियाँ न हुई हों, ऐसी आशा, ऐसा दावा मैं नहीं करता। मगर गलतियों के डर से, कोशिशों को रुकने, थमने मैंने कभी नहीं दिया। कभी सफलता मिली, तो कभी सीख़।

सीखा है कि जीवन में, हासिल करना ही सब कुछ नहीं, कभी कभार छोड़ने से भी मंगल होता है। और अशुभ हो फिर तो, शुभति शीघ्रम। यादें, आनंद साथ लातीं हों तो ही संजोना ठीक । जो आपके हाथ में था नहीं, और जैसा भी था, बीत ही गया तो बार-बार याद भी क्या ही करना ? बात केवल, दर्द को भुलाने की है। 

माफ़ कीजिए और भूल जाइये, मगर सबक याद रखिये, कीमती होता है। सौन्दर्य नैसर्गिक ही सच, और इसमें योगदान, आपके आचरण, आपकी मनोवृत्ति का भी निश्चित होता है। और मन अच्छा और मजबूत ना रह पाये तो शारीरिक स्वास्थ्य तो भूल ही जायें। कार की रफ्तार ही नहीं, नियंत्रण और ठहराव भी कीमती होता है।

अभी हाल ही में, शहीद पथ पर जाते हुये, एक पुराने से ट्रक को चलते देखा। चढ़ाई विशेष नहीं, मगर दम फूल रहा था, उसका । घिसे टायर, माल ढोते-ढोते चक्कर बहुत लगाये होंगे, बदरंग सी बाॅडी, डगमगाती स्टीयरिंग और धीमे-धीमे लगते, आधे-अधूरे ब्रेक। साथ-साथ चलता, अधीर होता ट्रैफ़िक, हाॅर्न पर हाॅर्न, लगा जैसे ट्रक का योगदान, अब ना आवश्यक रहा, ना प्रासंगिक । हालत जानी पहचानी सी लगी ।

अब शहीद पथ से बचता हूँ, भीड़ में आपकी सहज रफ्तार, किसी के लिये, अनायास ही बाधा, और प्रतिकूल बन जाया करती है । कोई सुनसान सा, वीरान सा रास्ता, ट्रैफिक कम हो, संगीत पसंदीदा हो, यादें खुशनुमा हों और सफर, सहज सा, कोई मंजिल हो तो अच्छा, ना हो तो और भी अच्छा । मन इसी में रमता है, आज-कल । रात के बूढ़े दिये, जो ठहरे। 

जिन जिन सुधिजनों ने अपना-अपना स्नेह और शुभकामनायें आज बरसाईं, सब का दिल से आभार ! आभार उनका भी, जो शुभेच्छु तो थे, पर बता ना सके, कारण जो भी रहा हो। आपको परमपिता का आशीर्वाद प्राप्त हो, आप सभी का मंगल हो।

बर्थ डे मना कैसे ? ये बतायेंगे फिर कभी !

Opening up !

Open Parachutes :
I began this blog way back, but couldn't continue, for various reasons. But now, as a free bird, I'm back to open my heart and mind here. My endeavour is to be me, myself, with malice towards none, including those who indeed have it, for my unintentional slip-ups, or misunderstanding.. whatever.
Hope, I'll be allowed this super luxury. Blogs are open to all but primarily targeted to my family, friends, and neighbourhood... Eldeco
Saubhagyam.
Feel free to comment.
Khair makdam 🙏

THE QUEUE....