तमाम, काम-तमाम !

Reaching out !

If, You're, throwing, a pool party, 
to a thirsty struggler, It's not generosity, my dear !

It's insensitive inconsideration, 
gross humiliation, utter insult.

It, better be, simple, natural water,
Not RO, not Mineral, not Kangen,
Just adequate, drinkable water.
AND, in time, as much, as required. 🤗

रायते की दावत !



ठेठ, देसी भाषा में, 

रायता वही फैलायें, और उत्ता ही फैलायें, 
जो खुद, समेट लेने का, 
इरादा भी रखते हों, और माद्दा भी। ☝️

रायता पहले ही, बहुतेरा फैला हुआ है, 
इसे और फैलाने, और, 
औरों के लिए, समेटने को छोड़ देने की, 
कृपा करें, कोई जरूरत नहीं 🙏

जहाँ तक, हमारा खुद का सवाल है, 
ऐसे फैले पड़े हैं, 
कि सिमटना, आसान कहाँ ? 
शायद बटोरे ही जायें, किसी दिन 🤗



किं-कर्तव्य-विमूढ़ !


वाह-वाही, या प्रभुताई तलाशते, ऐसे लोग, आपको बड़ी आसानी सा दिख जायेंगे कि साहब, मरते मर जायेंगे, कितना ही दुख, तकलीफ, नुकसान हो, गलत काम को हाथ भी नहीं लगायेंगे। अंग्रेजी से एमए पास, मगर एक वाक्य, ता-उम्र ना बोल पाने वाले लोग, इसी कैटेगरी में मानें।

लाख बेहतर हैं, वह लोग, जो गलत सही की परवाह बगैर, यथापेक्षित काम, ससमय करते हैं। जानते हैं कि सही-गलत का अन्ततः निर्धारण तो समय करता है, परिणाम के माध्यम से, तब तक, किसी का सही, किसी का गलत, यह व्यक्ति-परक, परिस्थिति-परक और तत्कालीन भी हुआ करता है। दोषी, आप गलत काम कर डालने के लिए ही नहीं, अपेक्षित कार्य, समय पर ना कर पाने के लिये भी, अकृत-कार्य, माने जाते हैं।

आशय, यह नहीं, कि प्रकटतः गलत कार्य भी आप, लोभ में, लालच में, राग में, या द्वेष में, या भयातुर होकर, करने से पहले विचार ना करें। अन्तर्मन, अगर आप के साथ है, तो अपेक्षित काम, बिना समय गंवाए, करना ही उचित। ये भी कि, अन्ततः तो-

"हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश, विधि हाथ !"

और विधि के आगे, हमारी, या आपकी, खास चलती नहीं। काम समय पर होना ही सार्थक, आगे भगवान की इच्छा 🙏

बोझिल जीवन !

अपने, सबसे बड़े चाचा, एक कुंतल, यानी एक सौ किलो की बोरी को भी, बहुत सहजता के साथ, उठा लिया करते थे, आम आदमी से तो, हिला पाना भी मुश्किल। थोड़ी ताकत, थोड़ी तरकीब, मैं तरकीब ज्यादा कहूँ, इसलिए कि तरकीब तो, ताकत बढ़ाने के काम भी, आती है।

तो किसी आदमी को, एक कुंतल की बोरी, हँसते हँसते उठाये देखो, तो याद रखना, वजन तो उसकी बोरी का भी, सौ ही किलो है, राई रत्ती कम नहीं, सिर्फ उसे आती है, तरकीब भी। ऐसे ही, आपकी बोरी, कोई स्पेशल भारी नहीं, फ़कत तरकीब, बोलें तो, ठीक से उठाना, नहीं सीख पाये। बोरियाँ, हल्की भारी, तकरीबन, एक सी !

ये भी, कि कुछ लोग ये समझ जाते हैं कि रोने-धोने से, शिकवे-शिकायतों से, किसी और पर दोषारोपण से, वज़न, कम थोड़े ही होता है, अलबत्ता, उठाने की ताकत, जरूर कम हो जाती है। संयम-संतुलन-साहस से सामना करें तो भी, वजन तो उतना ही रहता है, मनोवैज्ञानिक सपोर्ट से, ताकत इक्कीस लगने लगती है।

वैसे वज़न जो मिला, सो मिल गया, इस पर, जोर, किसी का है भी नहीं 🤔

THE QUEUE....