गंगा-स्नान !

बैठना गंगा-तीरे, और स्नान करते लोगों को, ध्यान से देखना। प्रायः सभी प्रफुल्लित दिखेंगे, सौभाग्यशाली, पुण्यार्थी !

इन्हीं के बीच, कोई कोई दिखेगा, असहज, असंतुलित, छटपटाता, हाथ-पैर फैंकता। स्पष्टतः, सामन्जस्य बैठ नहीं रहा है, उसका। अब गंगा का वेग प्रचण्ड है, या तो उसकी क्षमतायें चुक रही हैं, अपर्याप्त हो रही हैं।

अधिक देर तक, ऐसा चल नहीं पाता, छटपटाहट कम होती जाती है, थम जाती है, फिर कोई शोर भी नहीं। शायद तैरना आ गया, संतुलन वापस पा लिया, उसने। यही एकमात्र निहितार्थ नहीं है, मगर। ये भी हो सकता है, जीवन संघर्ष के परे हुआ, वह असहाय, निरीह।

आपकी भूमिका, ससमय, यथा सामर्थ्य, सहायता की भी हो सकती थी, रील बनाने की भी, इस तरह कहानी सुनाने की भी, जो भी, मगर अब तो, चिड़िया उड़ गई, खेत चुगा, ना चुगा, क्या ही फर्क ? 

अब, अपनी अन्तरात्मा को, जवाब देते रहिये, ता-उम्र! 🤗

परिवार की बात, बात की बात !




"रानी रूठेंगी, तो, सुहाग, अपना ही, तो लेंगी !"

यह लोकोक्ति, राजा दशरथ के समय से, या शायद, और पहले से, चली आती है। मगर आज भी, उतनी ही सटीक, उतनी ही प्रासंगिक, कीमती और महत्वपूर्ण है।

दो अपवाद भी हैं, इसे, या तो पति निकम्मा हो, या/तथा, पत्नी आत्मनिर्भर हो । सामान्यतः संयोग से, सौभाग्य से, पति पत्नी के दायरे, प्रायः लगभग स्पष्ट होते हैं, अपनी बात कहिये, जरूर, फ़रमान नहीं ना सुनायें, मजबूर नहीं ना, करें। 

मनमानी ही होती हो, तो जो भी कहो, ये परिवार तो, नहीं । परिवार में, अहं नहीं होता, छोटा बड़ा नहीं होता, अहसान नहीं होता, मजबूरी भी नहीं होती, अपना, अपना तो ख़ैर, होता ही नहीं। साथ तैरना, साथ ही डूबना, इतर, सब रास्ते, बर्बादी की और। 

माँ-बाप, भाई बहन, अपने ही बच्चे, हमदर्द सहकर्मी, सब अपनी जगह, मगर पति, या पत्नी की जगह, कोई नहीं लेता, ले सकता ही नहीं। फौरी बात और !

कि रिश्तों में, समझदारी, बहुत होना, जरूरी है !
बुरा, दोनों को लगता है, समझना, ये जरूरी है !
हों गैर, तो ख़ैर, वास्ता कैसा, बुरा, अपनों का लगता है,
जरा सी बात है, लेकिन, समझना भी, जरूरी है !!




आँधियों की माफ़ियाँ !

तमसो मा ज्योतिर्गमय !





कुछ लोग होते है, जो बस आराम करते हैं, काम कुछ, करते ही नहीं, इसीलिए उन्हें, कुछ आता भी नहीं, वो कोशिश भी नहीं करते, फिर भी, काम करने वालों से, खुद को, बेहतर साबित करने की, तरकीब अच्छे से पता है, उन्हें। 

तुरत-फुरत, किए हुए काम में, कमियाँ निकालने लग जाते हैं, अब, अगर कमी निकालनी ही हो तो, कुछ ना कुछ तो, झूठा सच्चा ही सही, मिल ही जायेगा। इसके आगे, "भई, काम खराब करने से तो, अच्छा है, जब तक आता ना हो, दूर रहो। हमने काम ना किया हो, कम से कम, नुकसान तो नहीं किया"

यही विकल्प, दूसरे के पास भी है, वह भी, इनके किये काम में, जब भी करें, कमियाँ निकाल सकता है। दोनों पक्ष, एक दूसरे की कमियाँ, तलाश करते रहेंगे, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशों में, लगे रहेंगे, हतोत्साहित करते रहेंगे। इस खींच-तान में, कम से कम, काम तो कोई, होने से रहा। 

सकारात्मक रहो तो, खराब से खराब काम में भी, अच्छाई, निश्चित ही मिलेगी। आप, प्रोत्साहित भी कर सकते हैं, अगली बार, पिछला अनुभव होगा तो, कमियाँ घटेंगी, और गुणवत्ता बढ़ेगी, इसमें श़क कोनी। यही, प्रगतिशीलता का मूल मंत्र है।

आप, मेरे घर का, दिया बुझायें, मैं, आपके घर का, तो अंधेरा, और घना हो जायेगा, कटेगा नहीं। कटेगा तभी, जब मैं, आपका दिया, बुझाने की जगह, अपना दिया जलाऊँ, धीमा हो, मद्धम हो, तो भी, अंधेरा, कुछ तो कम होगा ही। सम्भव है, आप भी प्रेरित हों, सद्बुद्धि आये तो, दिया जलायें, घर का कोना कोना रोशन होते, देर ना लगेगी।

तमसो मा ज्योतिर्गमय ! यही सार है 🤗

THE QUEUE....