नींद सुकून की !

बात भोजन की : जुटाना, बनाना, खाना-खिलाना !


इस प्रसंग के निहितार्थ, बहुत मूल्यवान हैं कि घर में खाद्यान्न की व्यवस्था करने वाला अधिक महत्वपूर्ण है, या उस खाद्यान्न को, सुरुचिपूर्ण खाद्यपदार्थ में, बदलने वाला ?

वैसे, सबसे पहले तो यह प्रश्न उठना ही दुर्भाग्यपूर्ण है, इसलिए कि भोजन की व्यवस्था, एक सामूहिक प्रक्रम होता है, होना चाहिए, सर्व-सहयोग से, बिना योगदान कम-ज्यादा होने के, किसी विवाद के। 

खाने के स्वाद, और शरीर को लगने में, मन की भूमिका अद्वितीय होती है, मूलभूत भी। विवादों में उलझकर, मन ही खराब हो जाये, तो अच्छे से अच्छा पकवान भी, ना स्वाद आता है, ना तन को लगता है। भूख ही मर जाती है, तो खाया क्या, ना खाया क्या ?

मगर अगर निर्णय लेना ही हो तो खाद्यान्न की व्यवस्था, पहली अनिवार्यता है। यही ना हुआ तो पाक कला, धरी की धरी रह जाती है, अप्रासंगिक। खाद्यान्न की व्यवस्था है, अच्छा नहीं भी बन पाया, तो स्वाद भले ही ना आये, पेट तो कच्चे पक्के से भी, भर ही जाता है। भूख शान्त तो हो ही, जाती है। 

इन्सान जब कभी, विपरीत परिस्थितियों में उलझा है, अकल्पनीय, साधन प्रयोग कर के भी, जिन्दा बना रहा है। जैसी भी हो, पर जान रहती है। और जब तक जान है, जहान की उम्मीद, कायम रहती है। 🤗

गंगा-स्नान !

बैठना गंगा-तीरे, और स्नान करते लोगों को, ध्यान से देखना। प्रायः सभी प्रफुल्लित दिखेंगे, सौभाग्यशाली, पुण्यार्थी !

इन्हीं के बीच, कोई कोई दिखेगा, असहज, असंतुलित, छटपटाता, हाथ-पैर फैंकता। स्पष्टतः, सामन्जस्य बैठ नहीं रहा है, उसका। अब गंगा का वेग प्रचण्ड है, या तो उसकी क्षमतायें चुक रही हैं, अपर्याप्त हो रही हैं।

अधिक देर तक, ऐसा चल नहीं पाता, छटपटाहट कम होती जाती है, थम जाती है, फिर कोई शोर भी नहीं। शायद तैरना आ गया, संतुलन वापस पा लिया, उसने। यही एकमात्र निहितार्थ नहीं है, मगर। ये भी हो सकता है, जीवन संघर्ष के परे हुआ, वह असहाय, निरीह।

आपकी भूमिका, ससमय, यथा सामर्थ्य, सहायता की भी हो सकती थी, रील बनाने की भी, इस तरह कहानी सुनाने की भी, जो भी, मगर अब तो, चिड़िया उड़ गई, खेत चुगा, ना चुगा, क्या ही फर्क ? 

अब, अपनी अन्तरात्मा को, जवाब देते रहिये, ता-उम्र! 🤗

परिवार की बात, बात की बात !




"रानी रूठेंगी, तो, सुहाग, अपना ही, तो लेंगी !"

यह लोकोक्ति, राजा दशरथ के समय से, या शायद, और पहले से, चली आती है। मगर आज भी, उतनी ही सटीक, उतनी ही प्रासंगिक, कीमती और महत्वपूर्ण है।

दो अपवाद भी हैं, इसे, या तो पति निकम्मा हो, या/तथा, पत्नी आत्मनिर्भर हो । सामान्यतः संयोग से, सौभाग्य से, पति पत्नी के दायरे, प्रायः लगभग स्पष्ट होते हैं, अपनी बात कहिये, जरूर, फ़रमान नहीं ना सुनायें, मजबूर नहीं ना, करें। 

मनमानी ही होती हो, तो जो भी कहो, ये परिवार तो, नहीं । परिवार में, अहं नहीं होता, छोटा बड़ा नहीं होता, अहसान नहीं होता, मजबूरी भी नहीं होती, अपना, अपना तो ख़ैर, होता ही नहीं। साथ तैरना, साथ ही डूबना, इतर, सब रास्ते, बर्बादी की और। 

माँ-बाप, भाई बहन, अपने ही बच्चे, हमदर्द सहकर्मी, सब अपनी जगह, मगर पति, या पत्नी की जगह, कोई नहीं लेता, ले सकता ही नहीं। फौरी बात और !

कि रिश्तों में, समझदारी, बहुत होना, जरूरी है !
बुरा, दोनों को लगता है, समझना, ये जरूरी है !
हों गैर, तो ख़ैर, वास्ता कैसा, बुरा, अपनों का लगता है,
जरा सी बात है, लेकिन, समझना भी, जरूरी है !!




THE QUEUE....