असाधारण और प्रेरक

GM friends !

Dr. Sharda Suman, has been in the news recently, for the most valid reasons.

I'm pleased, and proud to present, Dr. P K Das, not in person, but as a personality, so instrumental back stage, and as our family friend.

The relevant details were shared by Dr. Das, himself. I'm also sharing, words of appreciation, I extended.

The sole purpose, to spread the beauty, fragerance, so sweet, and inspiration of a noble deed.

Wow ! Great, Dr. 👌, done us all tremendous proud 👍. 🙏.

कुछ उपलब्धियाँ साधारण होती है, कुछ की कीमत होती है, और कुछ होती हैं, बेशकीमती !

बिरले ही कुछ सौभाग्य से उपलब्ध होतीं हैं, जिनकी कीमत लगाई ही नहीं जा सकती। इन्सानी जीवन की क्या कीमत, और उसे बचाने में, किसी की विशिष्ट भूमिका। 

जब भी याद आयेगी, गर्व होगा ही होगा। हमें ही होगा, फिर आप तो सूत्रधार हुये 🙏

रास्ते के मोती



तीन   पहर   तो   बीत   गये, बस  एक  पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया, बस  खाली  मुट्ठी  बाकी  है।

सब  कुछ पाया इस जीवन में, फिर   भी   इच्छाएं  बाकी  हैं
दुनिया  से  हमने   क्या  पाया, यह लेखा - जोखा बहुत हुआ,
इस  जग  ने हमसे क्या पाया, बस   ये   गणनाएं   बाकी  हैं।

इस भाग-दौड़  की  दुनिया में, हमको इक पल का होश नहीं,
वैसे   तो  जीवन  सुखमय  है, पर फिर भी क्यों संतोष नहीं !
क्या   यूं   ही  जीवन  बीतेगा, क्या  यूं  ही  सांसें बंद होंगी ?
औरों  की  पीड़ा  देख  समझ, कब अपनी आंखें नम होंगी ?
मन  के  अंतर  में  कहीं  छिपे, इस  प्रश्न  का  उत्तर बाकी है।

मेरी    खुशियां,   मेरे  सपने, 
मेरे     बच्चे,     मेरे    अपने, 
यह  करते - करते  शाम हुई,
इससे  पहले  तम  छा जाए, इससे  पहले  कि  शाम ढले, 
कुछ  दूर   परायी   बस्ती में, इक  दीप  जलाना बाकी है।
तीन   पहर   तो   बीत   गये, बस  एक पहर ही बाकी  है।
जीवन हाथों से फिसल गया, बस खाली  मुट्ठी  बाकी  है ।

सौजन्य से, 🙏

ऐंवे ही !


तू,उस दिन तो मेरा ख्याल, जरूर ही कर लेना।
जिस दिन, मेरी पात्रता, थोड़ी कम पड़ रही हो।

 

 
उसी दिन तो, मुझे तेरी जरूरत, सबसे ज्यादा होगी 😀


Close to my heart, today


जाहिल ! बेवकूफ, को ज्ञान ही नहीं था कि ये काम तो नामुमकिन है। क्या ही करें, अब तो उसने कर डाला !!

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हमारी कुक, आज दोपहर, खाना बनाकर जाते हुये फ्रिज से बर्फ निकालकर ले जा रही थी। रोजाना ही ऐसा करती है, उसका पति, नीचे सब्जी का ठेला लगाता है। ये बर्फ वह पीने के पानी में डालेगी, और दोनों साथ-साथ खाना खाते हुये, ठण्डा पानी पीने का सुख पायेंगे। यह सुख, किस भाव मिला, आपने नोट किया ?

अगर आपका मन होगा तो आप मूड बनायेंगे, तैयार होंगे, गाड़ी निकालेंगे और जायेंगे शायद, हजरतगंज, रायल कैफे, मोती महल, या फिर कोई माॅल, कोई शेक, स्मूथी या डेजर्ट, अच्छा खासा बिल, टिप ऊपर से। फिर भी उस तृप्ति तक पहुँच पाना, लगभग असम्भव। हो सकता है, जाते हुये ही आपस में बहस हो जाये कि कपड़े क्या डालें, चलें कहाँ, और करें क्या?
हाथ क्या आया, रकम कितनी साथ है के साथ-साथ, भाव पर भी डिपेन्ड करता है और खरीदारी के सलीके पर भी। कमाते होंगे आप ढेर सारा, मगर अमीर कौन ? सोच के देखिये

😀

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 05-07-2021

एक वार्ता देखने का अवसर हुआ, जावेद अख्तर के साथ । और केन्द्र वक्तव्य, "इस दुनियाँ में, आधे से ज्यादा घरेलू फसादों की जड़ में, मां-बच्चे के बीच का बेपनाह प्यार होता है । जिन्दगी बहुत बेहतर, और सुकून भरी हो जायेगी, अगर ये ऐसा, और इतना ना हो"
चौंकाने वाला, हैरानी भरा वक्तव्य ! जावेद आगे समझाते हैं, नई नवेली पत्नी की तुलना, घर-घर में मां से जरूर होती है, खाना... अच्छा तो बना है, मगर मां के हाथ की बात ही अलग है, आदि आदि। इन्सानी फितरत, कि जो रह गया, सारा ध्यान वहीं अटक के रह जाता है। उससे इतर, अगर कुछ बहुत सारा मिला हो, तो भी, नजर कहाँ ही चढ़ता है।
जायज़ नाजायज़, सास की तरफ, हमेशा ही झुका ये तराजू, हर बहू की जैसे नियति, पीढ़ी दर पीढ़ी, चलती चली आ रही है। गुणवत्ता पतन की, जो यह आभासी अनुभूति शाश्वत है, सही कैसे हो सकती है। और इसके मूल में है, मां-बच्चे के बीच का बेपनाह प्यार, और अटूट सम्बन्ध। जितना प्रगाढ़ होगा, पत्नी के आपके जीवन में आने का दरवाजा, पूरा खुलने ही नहीं देगा। और यही है सास-बहू के बीच, परस्पर मन मुटाव की सबसे आम वजह ।
चूक कहाँ हो रही है ? तुलना, आम और अमरूद की । प्रतिस्पर्धा की ना जगह है, ना औचित्य, ना अवसर। दोनों परस्पर विकल्प कहाँ हैं, अनुपूरक समझेंगे, तो जैसे दो दरवाजे खुल गये, अलग-अलग, मगर साथ-साथ, आवागमन में सुविधा हो गई, एक दूसरे के बाधक ना रहे। शायद टकराव का कारण ही ना रहा।
तुलना, और फिर प्रतिस्पर्धा, को आज की जिन्दगी में, अनायास ही, उचित से बहुत अधिक महत्व मिल गया है, जबकि प्रासंगिकता है ही कितनी। हर जीवन अलग है, हर फूल अनोखा है, मगर पागलपन ही है। प्रतिस्पर्धा परपीड़ापरक भी होती है । हर सूरत में, येन-केन-प्रकारेण, सबसे आगे होना ही है, और सब को ही होना है। बराबर की लाइन से तो, लम्बा होना ही है । उसे छोटा करना, अगर आसान हो तो, यही सही। कोई ताज्जुब, कि लाइनें, सारी की सारी, मिटने के कगार पर खड़ी हैं । जो बची हैं, उनका होना भी कोई होना है।
मैं तो कहता हूँ, इतना ही जरूरी है अगर, बराबर में लाइन चाहिए ही चाहिए अगर, तो अपनी ही, गुजरे कल वाली लाइन को ले लो ना। उससे बड़ा होकर निकलो। छोटा करना पड़े, मिटाना भी पड़े, तो कोई नहीं।
ये विन-विन सिनारियो है, नुकसान का चक्कर ही नहीं 🙏
Dhirendra Singh, Bhola Shankar and 7 others
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 28-06-2021

विडम्बना ही कहें कि जमाने में, "संतुलन" को महत्वानुक्रम में यथोचित स्थान, अभी तक तो उपलब्ध नहीं हो सका। सिवाय इसके कि जब किसी का टोटल बंटाढार हो चुका होता है, तब हम कहते हैं, बैलेन्स आउट हो गया बेचारे का। सोचा समझा न सही, पर है यथार्थ !
बैलेंस, खरे सोने में तांबे का, यानी कीमती होने के बीच काम के भी होने का, आदर्शों के व्यावहारिक और प्रासंगिक भी होने का.... कितने ही उदाहरण । विस्तार के सापेक्ष संक्षिप्त होने का भी, 😜। कुल मिला कर, अतियों के बीच इष्टतम के चुनाव का।
अति-तम की धारणा काल्पनिक है, अस्तित्वहीन, और संतुलन की आवश्यकता सतत उपस्थित, अनिवार्य। वैसे संतुलन स्थिर नहीं, परिवर्तनशील है, समय, स्थान, व्यक्तियों और परिस्थतियों के अनुसार बदलता भी/ही रहता है।
उजाले का गुणगान, तो हर कोई करता है। आज मेरी कोशिश है कि आपकी दोस्ती अंधेरे से भी कराऊँ। सही से देखें, तो ये एक दूसरे के विकल्प नहीं, सम्पूरक हैं । एक का लोप, दूसरे को भी ले ही डूबेगा, कोई और रास्ता है ही नहीं। दुश्मन नाम की चीज, सोचें अगर रहे ही ना, तो दोस्त का कोई अर्थ बचेगा भी। दुश्मनी का ना होना ही, दोस्ती है।
अगले दिन की सुबह कैसे हो पायेगी, अगर बीच में रात से गुजरना ना हो। इन्सान का दिल फैलता है, फिर सिकुड़ता है तो ही धड़कन बनती है, और ये क्रम, बारी-बारी जब तक होता रहता है, तभी तक जीवन। पतंग कोई उड़ती नहीं, अगर आप ढील ही देते जायें, बीच बीच में खिंचाव भी परम आवश्यक है। हे देवियों, अपने अपने देवों को, केवल खींच कर रखने से काम बनता नहीं, बीच बीच में, राहत भी जरूरी है।
जरूरी है कि आप हमेशा सटीक सही ना ही हों, गर्व रास्ता देख लेता है। अच्छा है कभी-कभार गलत भी करें, सही ही करने के तनाव से मुक्त हो जायेंगे, विनम्रता बनी रहेगी और किसी से गाहे बगाहे कुछ गलत हो भी जाय, तो दिलो दिमाग में बर्दाश्त की गुंजायश भी।
याददाश्त अच्छी हो, फायदे की बात है, मगर कुछ बातें भूल जाना भी शुभ। यानी संतुलन, क्या याद रखने जैसा है के साथ-साथ, क्या छोड़ना भी योग्य, मूल्यवान है। आप पढ़ें लिखें, शिक्षित और योग्य बनें, हर कोई चाहता है, मगर तराजू एक तरफ झुकती ही जाये, तो कितने ही लोगों का पारिवारिक जीवन नर्क होते खूब देखा है। तभी तो कोई दुआ करता है
पढ़े लिखों को, थोड़ी-थोड़ी, नादानी दे मौला !
यथार्थ, और सटीक 🙏

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 20-06-2021

भलमनसाहत तो यही है कि, आप कायनात को, उससे ज्यादा देकर जायें जितना आपको मिला है, उससे !
आज मेरा दिन है, पिता का दिन, कम से कम बच्चों के लिये तो है ही। बच्चे जिनमें मेरा जीव है, या फिर विचार हैं, या तो फिर दोनों हैं।
माता पिता, भगवान की बनाई वो एफ डी होते हैं, जो आपसे पहले दुनियाँ में आती है । एफ डी, साधन-सुविधाओं की, संस्कारों की, सुरक्षा की और सलीके की। अगर ठीक-ठीक चले तो इसकी ब्याज ही पार उतार देती है, वर्ना तो ख्वाहिशों का कोई ठिकाना तो होता नहीं।
माता पिता, जैसे साइकल के दो पहिये। माता, जैसे आगे वाला पहिया, साफ सुथरा, हमेशा आंखों के सामने, दिशा देता। कीचड़-गड्ढे से बच बचाकर निकल पाने की सुविधा होती है, इसके पास। साइकल पर सवार बच्चे भी, आम तौर पर, इसी पहिये को जानते पहचानते हैं।
पिता, यानी पीछे वाला पहिया। शायद ही कभी नजर जाती हो उस तरफ। उसके लिये आकर्षक दिखने से ज्यादा जरूरी, स्थिरता और मजबूती होती है, हवा बराबर रखनी पड़ती है। रफ्तार बनी रहे, ये इसी के जिम्मे। अपनी-अपनी भूमिकायें। पहिये साथ-साथ घूमते हैं तो जिन्दगी आगे चलती है। साइकिलें आजकल वैसे, फ्रन्ट व्हील ड्रिवन भी खूब दिखतीं हैं, बोथ व्हील ड्रिवन भी, और मोनो व्हील भी 😀
बच्चे पिता बनने लायक हो गये, समझो, खुद एफ डी हो गये। पिछली एफ डी की ना जरूरत, ना संगति, ज्यादा से ज्यादा एक धरोहर। हम यहीं हैं आज। पिता कैसे रहे, इस बहस का हिस्सा हम नहीं। सभी तो, अच्छा करना चाहते हैं। हुआ कितना ? बच्चे जानें, या फिर समाज, या फिर समय।
जो भी किया, कोई उपकार नहीं। कर्तव्य, सबसे पहले स्वयं के प्रति। एक प्रयास उऋण होने का, अपने पूर्वजों से, समाज से, कायनात से। किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं। बच्चे सुखी हैं, सकुशल हैं और समाज को योगदान में सक्षम, इतना बहुत !
🙏
Suman Singh, Dhirendra Singh and 23 others
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 06-06-2021

"आखिर, मैं हूँ कौन ?"
यह दर्शन, या फिर धर्म का कोई भारी-भरकम निहितार्थ वाला, जटिल सा सवाल नहीं है। ये तो मेरी रोज-मर्रा की जिन्दगी मुझसे, हर बार पूछती है, जब भी खड़ा होता हूँ, आइने के सामने।
और अच्छा लगे, या अच्छा ना भी लगे, सच यही है कि भले हम कभी काजू-किशमिश-बादाम ही क्यों ना रहे हों, वैसे कोई दावा नहीं कि हम वाकई कभी थे ही, अगर रहे होते तो भी क्या, आज की तारीख में, गोबर से ज्यादा कुछ नहीं। चन्द यादें, जिन पर मन हो तो घमंड कर लें, और अत्यन्त सीमित प्रासंगिकता, उपयोगिता।
और हमारी जगह, अगर किस्मत अच्छी हुई तो, उपले की शक्ल में दीवार पर लगा दिये जाते हैं, स्मृति चिन्ह की तरह, धीरे-धीरे सूखने के लिये। सूख जायेंगे तो एक किनारे, करीने से रख जायेंगे। तीज-त्यौहार, अज्ञारी सदृश उपयोगार्थ ।
यह आम नियति है, कोई आ गया है, कोई रास्ते में है। बात, केवल तालमेल की है। आज एक्सप्रैस वे के जमाने में, चेतक का भी क्या उपयोग, संगति नहीं है ना । आउटडेट होते देर लगती है क्या ?
और चेतक, भले सदियों में कोई कोई आता हो, एक्सप्रैस वे पर दौड़ने वाली कारें, हर घड़ी इतनी आ रही हैं, हमेशा पहले से बेहतर । और ये भी पलक झपकते, बीती बात हो जाने वाली हैं।
तो साहब, ठीक से जान लें। इसे चाहे तो निराशाजनक कहें, या सच से साक्षात्कार, और स्वीकारने का अपूर्व अवसर ! अगर ठीक से हो गया, तो देखना, हताशा नहीं, हताशा से मुक्ति ही, इन्तजार करती मिलेगी 👍
अनुपूरक:
गोबर, अगर दिमाग में भरा हो तो चिन्ता की बात हो सकती है। मगर खुद, एक दिन गोबर हो सकने की सामर्थ्य प्राप्त होना सौभाग्य की, और सच में हो ही जाना, निश्चित गौरव की बात है।
सामर्थ्य, यानी भगवान ने आपको इतना भरा-पूरा बनाया हो कि आप बांट भी सकें । साहसी और महामना भी, कि दे ही डालें । कभी किसी सूखी लकड़ी, या पाॅलिथीन को गोबर बनते देखा है ? यह परिणति, उसी को उपलब्ध होती है जिसे भगवान का वरदान, खुले हाथों मिला हो।

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 03-06-2021

बहुत लोग, हमसे शिकायत रखते हैं कि हम काम नहीं, काम की सिर्फ बात करते हैं।
काम किये बिना, किसका काम चला है ? काम तो, हम भी करते हैं, वर्ना किस काम के रहेंगे, मगर हमें पता है, कितना काम, कितने काम का है वर्ना काम की भला कोई इन्तहा होती है, और जो काम, काम ही ना आने वाला हो, वो भला किस काम का।
कभी-कभार बिना काम, काम की सिर्फ बातें भी बड़े काम की होती हैं।
है ना, काम की बात ? 😜

THE QUEUE....