त्रिमूर्ति


त्रिमूर्ति की अवधारणा, अर्वाचीन है, मगर शाश्वत है, या कि हम सभी के अन्दर, चिर-स्थापित रहती है।

त्रिमूर्ति, बोलें तो, तीन स्वरूप। एक, जो आप, स्वयं को समझते हैं, दो, जो और लोग, आपको समझते हैं, और तीन, जो दर-असल, आप हैं।

एक, जो शादी से पहले, प्रेमी-प्रेमिका दोनों, एक दूसरे में देखते हैं, दो, जो शादी, थोड़ी पुरानी हो जाने के बाद एक दूसरे में, देखने लगते हैं, तीसरे जो, वस्तुतः होते हैं, ईगो से बाहर पायें तो, देख भी सकते है, और तो और, सुख-शान्ति से, साथ-साथ, रह भी सकते हैं।

आभार 🙏, आलोक खन्ना जी !

Happy Birthday, 75th !


23 जनवरी 1950, समय सुबह कोई 5 बजकर 20 मिनट, सूरज भी बाद में ही उगा होगा, जब दीदी, इस नश्वर संसार में, अवतरित हुईं।
वैसे, ये आँखों देखी नहीं है, मैं मौजूद, थोड़े ही था। दीदी ने, खुद बताया था, पंडित जी को, और पंडित जी ने, मुस्कराते हुए कहा था, "अगर आप बीस मिनट, केवल बीस मिनट, और इन्तजार कर लेतीं तो, ग्रहों की ब्रांड न्यू दशा में, विराजतीं। मगर यहाँ आने-जाने पर, किसका ही बस ?
मैं ख़ुद आया, कोई साढ़े सात साल बाद। सान्निध्य नापें तो कोई, सिक्सटी सिक्स एन्ड ए हॉफ साल (आज के बच्चे भी समझ लें, इसलिए ), शायद सबसे ज्यादा। विशेषाधिकार भी बनता है, उत्तरदायित्व भी, कुछ ऐसा भी, कह लेने का, जो किसी और के, बस की बात नहीं।
बड़ी बहन, आधी माँ, कही जाती है। माँ बोलें तो, कान पकड़ने का अधिकार, आपके भले-बुरे, हित-अहित के विचार का अधिकार, लाड़-प्यार के साथ, टोका-टाकी का भी, नाराजगी का भी। मगर, महत्वपूर्ण ये भी, कि बच्चे, कम देखभाल से ही नहीं, अत्यधिक देखभाल से भी, खूब परेशान होते हैं, ख़ासकर आजकल।
वापस, दीदी के बचपन में चलें, तो दीदी पीढ़ी की अगुआ थीं, सबसे बड़ी। दादी से दबंगई आई, प्रिंसिपल, तीसरी कक्षा में एडमीशन करने को राजी नहीं हुआ, तो दादी ने, अपने गाँव के स्कूल में, सीधे पाँचवी में, करा दिया। पाँच का एक्जाम, बड़ा एक्जाम होता था उन दिनों, बोर्ड कराता था, दूर-दराज, किसी सेन्टर पर, अनेक स्कूलों के छात्र, और दीदी ने सेन्टर ही टॉप कर डाला। यह पहचान जो बनी, शादी के बाद तक भी, साथ-साथ चली।
पढ़ाई को प्रोत्साहन, संसाधनों, और समर्थन की कमी, ना मायके में रही, ना ससुराल में। फिर नौकरी भी चुनी, तो टीचर की। यानी एक तो करेला था ही, नीम पर और चढ़ गया। माना, जूस हैल्दी होता है, मगर जो पिये, वही जाने। और पिलाने वाले का दिल तो, भरता ही नहीं, पिलाता ही जाता है, मोर ही मोर !
दीदी की ससुराल, रूढ़िवादी सोच की थी। जीजाजी की सुदूर तैनाती, उनके व्यापक सामाजिक दायित्व, प्रायः स्वतः आमंत्रित, ऊपर से, और फिर, असमय निधन। पूरा परिवार दीदी ने, अकेले, परिस्थितियों से जूझते हुये, संभाला। सभी बच्चों के शादी-ब्याह, और सैटिलमेन्ट, उन्हीं का संघर्ष का परिणाम। मायके में भी, जरूरत के समय, उन्हें बुलाने की, या ढूंढने की नौबत, कभी नहीं आई।
समीक्षा, जितनी आसान होती है, सम्पादन उतना ही मुश्किल। कुछ कमियाँ भी निश्चित ही मिलेगी, पर वे उन्हें कोई अपराधी नहीं, आम, सामान्य इन्सान ही बनाती हैं, जो गलत हो सकने का, कल कोई क्या कहेगा, का भी जोखिम उठाते हुए, साहसिक फैसले तो लेता ही है, उन पर चलने की हर-मुमकिन कोशिश भी करता है। गलती भी हो सकती है, इन्सान, हो ही नहीं सकती तो फ़रिश्ता।
अब तो 75 साल, किनारा नजदीक ही है। फर्ज की नदी, अब भी बहती ही जा रही है, मगर वक्त के साथ, रफ़्तार कम हो ही जाती है। एक और ख़ास बात, तली ऊँची हो जाये तो नदी आगे नहीं जाती, वापस लौट लेती है। बोलें तो, बच्चों की सामर्थ्य, ग़र आपसे अधिक हो तो समझो तली ऊपर हो गई। देखभाल, अब आप, बच्चों की नहीं, बच्चे, आपकी करेंगे।
समझो, गाड़ी के नाव पर आने का समय आ गया। गाड़ी, अब भी हाथ-पैर मारेगी तो नाव का संतुलन ही बिगाड़ेगी। यह नियम कुदरत का है, शाश्वत है, परे इससे, कोई नहीं।
मगर माँ का दिल है, और दो-तिहाई जीवन की आदत, इतना आसान नहीं है। शरीर साथ ना दे पाये, तो भी। फिर फ्रस्ट्रेशन, और क्रोध, और सब गुड़-गोबर। ऐसी ऐसी बातें मुँह से निकल जातीं हैं कि याद करो तो ख़ुद को शर्म आये। सारी साॅरियाँ, और पुचकार, समझो बैन्ड एड की तरह, घाव ढक तो लेती हैं, भर नहीं सकतीं। रिसता ही, टीसता ही रहता है, अन्दर ही अन्दर, कभी कभी ज़िन्दगी भर।
करें क्या ? हर बूढ़े की, यही बीमारी है, और लाइलाज है। और जो भी लाइलाज है, उससे लड़ने का फायदा कोनी, स्वीकारने में ही भलाई। यह समय, वानप्रस्थ का है। प्रभु से जान पहचान बढ़ाइये, आगे काम आयेगी, आख़िर में, वहीं तो जाना है। बच्चों को जरूरत हो, वो ख़ुद माँगे तो ही, सलाह दीजिये, केवल सलाह, फैसले नहीं। उनके सामर्थ्य पर, विवेक पर भरोसा रखिये और याद ये भी रखिये,
"जलो वहीं, और तब, जब वाकई जरूरत हो,
दिन के उजाले में, चरागों के मायने नहीं होते !"
उपरोक्त सम्बोधन का पूर्वार्ध, तो मेरा ही है, अर्धांगिनी को कैसे ही मालूम होगा। मगर उत्तरार्ध में भी, भाभियाँ, अपनी तरफ, अभी भी ननद पर, सीधे बोलने से बचना पसन्द करती हैं, परन्तु जो भी मैंने कहा, विरोध उसका कहीं कोई नहीं। तो, वक्तव्य हम दोनों का ही माने जाने में, जोखिम कोई ख़ास नहीं।
जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाइयाँ ! आप सौ साल जियें, स्वस्थ जियें और सानन्द जियें। बच्चों पर, हम लोग भी उन्हीं में आते हैं, प्यार और आशीर्वाद बरसाती रहें। और रोशन तभी हों, जब लाइट चली जाये, और लाइट कभी ना जाये, भगवान करे !

लेन-देन


गिनती की शरीर वैज्ञानिक बाध्यताओं से इतर, शायद ही कोई ऐसा काम हो जो, पुरुष तो कर सकता हो, और स्त्री ठान ले, फिर भी कर ना सके। साथ-साथ, शायद ही कोई काम, ऐसा होता है, जो पुरुष उपलब्ध हो, तो भी स्त्री से करवाना, उसे अच्छा लगता हो।

फिर काम को लेकर विवाद कैसे ? आपने प्रायः ऐसा, कहीं कहीं, लिखा देखा होगा, हम आपकी मदद कर सकें, इसमें कृपया हमारी मदद करें। 

Help us to, let us help you, please !

आशय क्या हुआ ? दरअसल, आप किसी की कोई भी मदद, तब तक कर ही नहीं सकते जब तक वो स्वीकार करने को सज्ज ना हो। मुट्ठी बन्द रही आये तो आपका दिया, ग्रहण हो ही नहीं सकता, वह फिर कोहिनूर ही, क्यों ना हो। हाथ फैलाना, और उसे दाता के हाथ से नीचे ही रखा जाना, सम्मान-असम्मान से इतर, प्रक्रियात्मक अनिवार्यता भी हुआ करती है।

हाथ फैलाना, प्रायः असम्मान-जनक मान लिया जाता है, ऐसा अनिवार्य नहीं। केवल तभी होता है, जब भीख माँगी जाये, याचना हो। कभी अर्पण भी करके देखिये, अनुसरण इसी व्यवस्था का ही, करना पड़ेगा।

केवल लेना ही लेना, निकम्मापन, केवल देना ही देना, अगर साशय हो तो उदारता, अन्यथा नादानी, कभी लेना भी, कभी देना भी, व्यावहारिक सामाजिकता। दुनियादारी। और ये परस्पर, द्विपक्षीय ही हुआ करती है। अनेक काम ऐसे भी होते हैं, जो प्रायः केवल स्त्रियाँ ही किया करती हैं, आ ही पड़े तो पुरुष भी, कर ही लेंगे मगर कोई भी स्त्री, ऐसा देखकर, गौरवान्वित अनुभव तो नहीं ही करेगी।

मदद देना भी, और मदद लेना भी, सामाजिकता का महत्वपूर्ण आयाम, अपेक्षित भी, क्यों कि अपनी पीठ, आप स्वयं स्क्रैच नहीं ना कर सकते, और इचिंग का क्या ? किसी को भी हो सकती है, कभी भी, और होती ही है।

गलत तो नहीं ?


Just Like That


 

Just Like That


 

Welcome !




अंधेरा, कितना भी सघन क्यों ना कर लो, अंधेरा मिटेगा नहीं। ये बस की बात, रोशनी की है, जरा सी भी !
 

सुप्रभात् ! 😀

असार, ही भड़भड़ा रहा है, मेरे दोस्त ! ये सुख का, खुशियों का, संतोष का दरवाजा, अन्दर की तरफ़, तेरे ही अन्दर की तरफ खुलता है। बाहर तो है, कुछ भी नहीं !


Absolutely delighted to resume !


 After more than a year, I return, with an intent to stay here only, and wind up everywhere, else. Some favorites will be brought in, and fresh blooming will happen, right here, now on.

#62 The Day of Retirement

 समधी साहब, आज (31-03-2023) सेवा निवृत्त हो गये।



नौकरी, ख़ासकर सरकारी, जैसे हवाई जहाज़ का सफर। टेक ऑफ कभी भी किया हो, कहीं से भी किया हो, दूरी कितनी ही रही हो, ऊँचाई कोई भी पकड़ ली हो, मौसम ख्रराब भी हुआ ही होगा कभी-कभार तो, डरावना टर्बुलेन्स, सीट बैल्ट, अब लगाओ, अब खोल सकते हो, सार किसी का, अब कोई भी नी।

सार है तो इतना कि लैण्ड, हर फ्लाइट होती है, एक ना एक दिन, देर-सबेर बात अलग । खुशकिस्मत हैं कि लैण्डिंग सेफ हुई है, हैप्पी हुई है। इतने सारे लोग रिसीव करने आये हैं, सी ऑफ करने भी। अब वक्त, घर लौटने का है, अपनी मर्जी की ज़िन्दगी जीने का है। सफर का कचरा, साथ ले जाने का नी। शुक्रिया उसका, जिसने सहूलियतें दी, सफर खुशनुमा और आसान बनाया, उसका भी जो मुश्किलों का सबब बना, और आपको सबक दे गया, मजबूत और समझदार बना गया।

सफर के गिले-शिकवे-शिकायत होंगे तो, मगर सब कचरा है, साथ ले भी जाना, काए को ? अच्छी यादें, कीमती अनुभव, जगह-जगह खरीदा हुआ, पसन्दीदा सामान, सुनहरे सपने, यही सब साथ ले जाने लायक है। घर सजाइये, संवारिये, और आराम से रहने लायक बनाइये, बनाये रहिये, और भूलिए मत, कि उस घर में, आप ख़ुद भी आते हैं

तो ढेर बधाइयाँ, सारी शुभकामनायें और हार्दिक स्वागत,

"ठलुआ क्लब" में ! 😀👍

#61 रूबरू, एक अर्से बाद 😀

'मुुर्शिद', हमारे साथ, बड़ा हादसा हुआ, हम रह गये, हमारा, ज़माना चला गया !


आभार, उद्धृत पंक्ति, और छायाचित्र के लिये, उनके स्वामियों के 🙏
ये तो है, आपकी शक्ति, आपकी क्षमता, आपकी सुपीरियरिटी पहले जैसी नहीं रही, आपकी ईगो को मिलने वाला दाना पानी कम हो गया, मगर सिर्फ आपका ही नहीं, सभी का, हर किसी का, ज़माना, एक ना एक दिन तो, जाता ही जाता है। किसी का, पहले ही चला गया था, किसी का जाने को तैयार बैठा है, और किसी के पास टाइम, अभी बाकी है, मगर जाना हर किसी का तय है, निश्चित है। देर-सबेर तो हो सकती है, मगर छूटेगा कोई नी, ना तो कोई स्कोप ही है।
आइये, ठीक से समझते हैं।
एक तो ये, कि 'इन्सान' नाम की, जो बेहद काॅम्लीकेटेड मशीन है ना, उसे बनाने की टेक्नीक, यहाँ तो किसी के पास है नहीं, और जहां कहीं, जिसके भी पास है, मोनोपोली है उसकी, उसे जिस भी नाम से पुकारें, डिलीवरी उसी की मर्जी से, उसी के तय समय पर और इस पर, निगोशियेट नहीं कर सकते आप। केवल दरवाजा, खटखटाते, रह सकते हैं। डिलीवरी अनपेक्षित भी हो जाया करती है, कभी-कभार, वैसे ।
ये मशीन आती है, इनबिल्ट लाइफ-लाॅन्ग बैट्री के साथ। चार्ज ये, रोजाना की रोजाना करनी पड़ती है, मगर रिप्लेसमेंट का कोई प्रोविजन नहीं। शुरू का रनिंग इन, मेरा तो विश्वास है, अधिकतम छः सात साल, कानून कहता है 18 साल, फिर कोई चालीस एक साल ठीक-ठाक। उसके बाद तो, प्राब्लम दर प्राब्लम, और ये प्राब्लम बढ़ती ही जाती हैं। बैट्री, अव्वल तो चार्ज पकड़ती ही नहीं, पकड़ ले भी, तो होल्ड नहीं करती। अन्ततः डिस्चार्ज, और फिर स्क्रैप, मतलब जिसका, कोई है ही नहीं !
यह व्यवस्था सतत, सनातन, और एक समान है, पीढ़ी दर पीढ़ी, अन्तर कोई नहीं, चाहे आपके पुरखे हों, या वंशज। मशीनें आकार-प्रकार में, प्रायः एक जैसी ही हुआ करती हैं, और उपयोगी जीवन काल सीमित। जो काम किया करती हैं, या कर सकती हैं वह बदलता रहता है, अलबत्ता, या ऐसा लगता है, बा-वजह कि संसाधन, सुविधायें बेहतर, और बेहतर होती जाती हैं, हम तरक्की कर रहे हैं, इवोल्व हो रहे हैं ना ?
जैसे, अपने पिता को याद करें तो, उन्हें शिक्षा दीक्षा के लिये, पैदल जाना होता था, हमें साइकल उपलब्ध हुई, और बेटे को मोटर साइकिल, उसके बेटे को, शायद कार। संसाधन बेहतर हों तो, जिन्दगी आसान होती जाती है, क्षमतायें बढ़ती जाती हैं। अन्तर यही है, अन्दर खाते, ख़ास कोई नहीं।
तुलना करना, जरूरी ही हो तो मैदान एक सा होना, अनिवार्य है । मेरे एक शिक्षक थे, वजन कोई अस्सी किलो, जबकि हमारा कोई पचास। स्वाभाविक है, उनमें फुर्ती कम पड़ती थी, जल्दी थकने लगते थे। हम उपहास करते तो, वह कहते, तीस किलो वजन, लाद लो पीठ पर, फिर बताना। उनकी बात, अब याद भी आती है, समझ भी, और यही समझना जरूरी भी है।
हममें से कितने ही हैं जिन्होंने पढ़ाई के समय, रिकॉर्ड तोड़ नम्बर प्राप्त किये थे, तहलका मचाया था, पर आज के दौर से तुलना करें तो नई पीढ़ी को, इतने नम्बर, उपहास के लायक ही लगते हैं। मोटर साइकिल चला रहे हैं ना, साइकिल चलाने वाले की कोशिश, समर्पण और परिश्रम कैसे समझ पायेंगे ? आपको भी, इसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । खेल का मैदान, एकसार जो नहीं है।
वक्त वक्त की बात है, मौसम बिल्कुल बदल चुका है। ऊपर से आपकी बैट्री पुरानी हो चुकी है, और नई पीढ़ी की टिप टाॅप। तुलना युक्तियुक्त है ही नहीं, साथ-साथ, चल नहीं पाओगे, तो क्या हुआ ? माँ-बाप, हर जमाने में, खुद अपने पैर जमा कर ही, अपनी सन्तान को आगे भेजते आये हैं। ये बात त्याग की है, उपकार की है, गौरव की है, फर्ज की है, शर्म की नहीं । अब अगर... अगर आपकी यही सन्तान, पीछे मुड़कर, देखना भी गवारा ना करे, तो ये बात कृतघ्नता की, शर्म की, कम से कम, आपके लिये तो, कतई नहीं ?

वैसे बच्चे फर्माबदार हों, बेइन्तहा प्यार करते हों, छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते हों तो भी क्या ? आप अजर-अमर तो होने से रहे ? मंजिल भी, और रास्ते भी, सब पहले से तय हैं, शायद वक्त भी। बाकी सब तो, समझाना है मन का। काम की बात इतनी सी है कि आपका ध्यान जरूरतों पर ही हो, ये कम से कम हों, जितना भी अफोर्ड कर सकें, आकर्षण कम हो जाये, तो भी चलेगा । आपकी जरूरतें, घर की बात होती हैं, ये हालात देखकर थोड़ा-बहुत एडजस्ट भी कर लेतीं हैं। ख्वाहिशें बाजारू, बन सँवर कर आती हैं, बला की कशिश, मगर इन्तहा इनकी कोई नहीं, ये कभी पूरी नहीं होतीं।
कुल मिलाकर, घर वापसी का कोई कन्ट्रोल, आपके हाथ में, है ही नहीं, और जो हाथ में ही नहीं, वो दिमाग में क्या रखना, और काए को ? जाना है, इतना पक्का है, कब जाना है, कैसे जाना है, आराम से, या संघर्ष करते हुये, कौन जाने ? और सबकी दशा एक, अमीर हो, पहलवान हो, लोकप्रिय नेता हो, बड़े से बड़ा अफसर हो, चलती यहाँ किसी की नहीं। फिर डर कर ही, क्या हासिल ? जियो ऐसे कि कभी जाना ही नहीं, सज्ज इतने कि अगले ही पल भी, गिला कोनी।

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।"

अर्थात्‌, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर, दूसरे नये वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा, पुराने शरीरों को त्याग कर, दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।
इस परम सत्य को, स्वीकार कर लेना ही, बुद्धिमानी । करो, या ना भी करो, जाने की प्रक्रिया पर असर, राई रत्ती नहीं। स्वीकार कर लोगे, राजी रहोगे, सज्ज रहोगे तो दर्द थोड़ा कम हो जायेगा, अफसोस भी, और गिला शिकवा-शिकायत भी।

अब मर्जी आपकी ! 😀👍

THE QUEUE....