मासूम !


प्रतिबन्धित इलाके में, वो केवल इसीलिए गये कि पता तो रहे, क्या नहीं देखना है, कहाँ नहीं जाना है 🤗

भगवान जाने, धर क्यों लिए गये ? 🤔

जान-पाण !


निपट मूरख़, अनपढ़, गँवार, कभी स्कूल कॉलेज गया होता, गूगल शूगल सर्च करना आता होता, तो शायद जानता भी, कि जो काम, वो अनायास ही, करे बैठा है, वो तो घोषित, जड़-असम्भव, सूची में शामिल है। करना तो दूर, कोशिश भी, निधेष, वक्त की बर्बादी !

मगर अब तो, हो गया, सो हो गया।
माफ़ी माँगने के सिवा, और करे भी क्या ? 🤗

Happy "शिक्षक दिवस" !


आज शिक्षक दिवस है, यानी शिक्षित करने वालों का, सिखाने वालों का, दिन। इसलिए, यह उक्ति, सर्वथा प्रासंगिक प्रतीत होती है:

"कमाया करो, खर्च करने से पहले, और,
सीखा करो, कुछ सिखाने से पहले ☝️"

शिक्षक, सच में होना, आसान बात नहीं, उत्सुक शिष्य, खुद और पहले, होना अनिवार्य होता है। आप, पहले स्वयं अनुभव करें, मनन करें, थोथा-थोथा उड़ा दें, सार-सार बचायें और तभी, इष्टतम को, समर्पित शिष्यों को, उपलब्ध करायें।

आजकल, टाइम है, किसके पास, मगर ? कौन झंझट पाले, यहाँ-वहाँ से, "AI" से, इकट्ठा करो, और फारवर्ड कर दो, अगला समझा करे। आप तो, गरिमा को, उपलब्ध हो ही गये। 

वैसे, इतना निश्चित है कि अगले ने भी, पढ़ना समझना कोनी, ऐसे ही आगे फारवर्ड कर देना है। हैरान ना हों, अगर आपकी, फाॅरवार्डेड पोस्ट, घूम फिर कर, आपके ही पास लौट आये, बिना ओपन हुए 😂

इसीलिए, आजकल चैक हवा में, हर तरफ तैरते दिखेंगे, कैश कोई कराता नहीं, खाते में पैसा है किसके पास ? तथापि, वास्तविक शिक्षकों की, तेजी से विलुप्त होती प्रजाति का, श्रद्धापूर्वक नमन, और अभिनन्दन ! 🙏



सात्विक भी, व्यावहारिक भी !


सच्चाई और ईमानदारी, सात्विक गुण हैं, और समझदारी व्यावहारिक। उतना सात्विक नहीं, मगर महत्वपूर्ण बहुत, संरक्षण देता है, सार्थक बनाता है, इसीलिए ! रीढ़ की हड्डी की तरह !!

पहचान भी पायेंगे, सम्मान भी, पर खड़े भी रह पायें, तभी ना ? 🤗

मूल्यांकन !


वो जो कहते हैं कि भगवान है, भी ? दिखता तो है ही, नहीं ! जान लें कि सिर्फ वही दिखता है, जब कोई और दिखना, बन्द हो जाता है । ये भी कि, वही देख भी लेता है, जब आप पक्का इन्तजाम कर लेते हो कि कोई और तो, नहीं देख रहा।

आपके, और आपके भगवान के बीच, किसी तीसरे को, लाना ही लाना, ना कोई मजबूरी, ना कतई जरूरी। ये चॉयस से ज्यादा, कुछ भी नहीं। भगवान के साथ, आपका यह सीधा संवाद, प्रायः आपके अन्तर्मन, या अन्तरात्मा के माध्यम से होता है।

तो अगली बार, जब आपका अन्तर्मन, किसी काम को करने को कहे, या तो करने से रोके, और आप फिर भी विपरीत करें, कि चार लोग क्या कहेंगे ? समझ लें कि अन्यथा सीधे सरल जीवन में गाँठ, आपने खुद लगा ली।अब पूरे मनोयोग से, ना तो आप कुछ भी कर पायेंगे, ना करे बिना, रह पायेंगे। और मज़े की बात, चार लोग, वहीं के वहीं, कुछ ना कुछ तो कहने पर तुले, चाहे कुछ भी करो 🤗

और, जो भी आप करें, ग़र स्वान्त: सुखाय से इतर, किसी से अनुमोदन लेकर, प्रशंसा पाने के लिये, या आलोचना से बचने के लिए किया तो, जाने-अनजाने, अपने संतोष, और कार्य समुचित संपन्न करने के आनन्द का नियंत्रण, किसी और के हाथ दे बैठे। अब, मर्ज़ी, मूड, मोटिव, सब फ्रंट सीट पर, आपका किया-धरा, सब पिछली सीट पर ? जी नहीं, डिक्की में। चांस की बात, चार लोग कृपालु हुए, तो बल्ले बल्ले, ईर्ष्यालु हुए तो ? बण्टाढार 😂

पूजा वाली बिल्ली !


एक कहानी से, अपनी बात कहूँ, एक गाँव, गाँव का एक परिवार, गृह स्वामी, स्वामिनी, एक बालक ..और एक बिल्ली। बिल्ली को घर के अन्य सदस्यों, जितने ही अधिकार प्राप्त थे, शायद, थोड़े ज्यादा ही। आने जाने पर, कोई रोक-टोक नहीं, घर का वही खाना, बाकियों जैसा ही, खाती थी, हर जगह पहुँच, दिन अच्छे गुजर रहे थे।

मगर, समय इन्सान को बूढ़ा, और बच्चों को युवा, बनाता ही है। एकाएक, गृहस्वामी चल बसा, और एक साल बाद, उसकी बरसी का दिन, भी आया। किसी ने चेताया कि, और कोई दिन तो, कोई नहीं, मगर बरसी का दिन, यानी पूजा का दिन। भोजन सामग्री की पूजा से पहले, बिल्ली कहीं झूठा ना कर दे, इन्सान जितना कहाँ समझेगी ?

उपाय हुआ कि, बिल्ली को, एक डलिया से ढक दिया जाये। साँस बराबर मिलती रहेगी, आना जाना कन्ट्रोल में। पूजा पूरी होते ही, टोकरी हटा देंगे, फिर से आजाद, घूमेगी फिरेगी, कुछ देर की तो बात। उपाय काम कर गया, और पूजा निर्विघ्न सम्पन्न हो गई। अब तो ये तरकीब, साल-दर-साल, आजमाई जाने लगी, बोलें तो, रस्म जैसी हो गई। 

बेटे की शादी हो गई, नई बहू ने, शुरू से ही, ससुर जी की बरसी का आयोजन, ऐसे ही होते देखा, और सीखा, और समझा। फिर सास भी, सिधार गईं। बहू ने, अबकी खुद से, ससुर जी की बरसी, उसी रीति रिवाज के साथ, पूरी की। कुछ साल चला, फिर एक दिन, बिल्ली भी चल बसी। अबकी बरसी, बहू टेंशन में थी, उपाय सूझता ना था। 

आखिर वह जा पहुँची, पड़ोसी चाची के यहाँ, मदद की विनती लेकर, "चाची जी, आपकी मदद चाहिए। ससुर जी की बरसी है, माताजी भी नहीं हैं, अकेली रह गई हूँ, बाकी सब तो इन्तजाम कर लिया, मगर बिल्ली का कैसे करूँ ? अगर थोड़ी देर को, आपकी बिल्ली, मिल जाती ?

चाची का हृदय, उदार था, खुशी-खुशी, अपनी बिल्ली, बहू के हवाले कर दी। साल, दो साल काम चला, फिर वो बिल्ली भी नहीं रही। मोहल्ले में, और किसी ने बिल्ली पाली नहीं थी। बच्चे भी बड़े, और सयाने हो गये थे, तो माँ को समझाया, कि बिल्ली पूजा में, कुछ करती थोड़े ना है, बस सांकेतिक ही तो है। उसकी जगह, नकली रख दें, असली जैसी ही, तो कौन फरक पड़ेगा ? रस्म ही तो पूरी होनी है ? 

और कोई, विकल्प ना देख, यही प्रस्ताव मान लिया गया। फिर माँ की भी उमर हो गई, तो बच्चों की सोच ही, मायने रखने लगी। बिल्ली का आकार, और महत्व, दोनोः कम ही होते गये। अब बच्चों के भी, बच्चों की चलने लगी है। बिल्ली को भूल, सारा ध्यान टोकरी पर आ गया है। सही भी है, वही तो दिखती है, उसके नीचे, कुछ भी हो, या ना भी हो, कौन देखता है ?

मगर, रीति रिवाजों का, बहुत ध्यान रखते हैं, बच्चे। अच्छी-अच्छी डिजाइन की, मँहगी सै मँहगी, टोकरी लाते हैं, चाव से, उत्साह से, सजाते हैं। आपस में, कम्पिटीशन, भी होता है, टोकरी किसकी, सबसे अच्छी ? टोकरी के नीचे, अब कोई बिल्ली नहीं होती, बस। और, जरूरत भी क्या ? 🤗

संघर्ष भरा जीवन !


ये लिखा-पढ़ी, ये गवाही, ऐसे ही नहीं है,
कोई तो जबान दे कर, मुकर गया होगा !

जीवन, अपने आप में, सहज सरल ही है, इसमें उलझनें तो, हम खुद लेकर आते हैं, अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह के चलते । छोड़िए औरों को, आप, खुद भी, कितने ही आगे, क्यों ना आ गये हों,  पलट पड़ें, अगर। जैसे भीड़ में, एक आदमी तो, वापस मुड़ा, चल पड़ा, सही दिशा की ओर, प्रकाश की ओर ! अँधेरा, कितना ही घना हो, एक दिया ही बहुत होता है। छोटा सा, नन्हा सा हो, तो भी।

यही "तमसो-मा, ज्योतिर्गमय" ! 

मैं, अकेला, ही चला था, जानिब-ए-मंजिल, मगर, 
लोग साथ आते गये, और कारवाँ बनता गया।

असीमित का सीमांकन !


तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा ! 
(He gets it, who's prepared to give it up) 
यह वेदोक्ति है !

यह भी कि "सबसे अधिक, वही जानता है, जो जानता है कि, वो जानता, कुछ भी तो नहीं।" 

"हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता", सुना है ना ?

यह, इस अस्तित्व, और आस्था की, विराटता का, अनादर और अस्वीकार है कि हम इसे, मापने की, परिभाषित करने का प्रयास करें। भक्ति, वैसे भी भावना-प्रधान होती है, और भावना की, केवल अनुभूति ही हुआ करती है, अभिव्यक्ति नहीं। हो ही नहीं सकती, इसलिए कि शब्दों की, कितने ही सारे, कितने ही सुन्दर कहे जायें, होती है सीमा।

दृश्य देखे हैं, पृकृति के, कोई ओर, ना छोर, विस्तार असीमित। आपने कैमरे में कैद कर लिया, और जड़ दिया फ्रेम में। अब कितना ही बड़ा, कितना ही सुन्दर हो ये फ्रेम, मगर दृश्य की सीमा बन गया। अब दृश्य की यह छवि, फ्रेम से बड़ी, नहीं हो पाएगी। दृश्य प्राकृतिक नहीं रहा, छाया-प्रति बन कर रह गया।

भगवान के साथ भी, हम यही कर रहे हैं। उसे भजनों में, पूजा विधियों में, कृत्य-अकृत्य में समेटना, परिभाषित करना, उसे सीमाओं में बाँधना ही तो हुआ । उदार, सुसज्जित, कितना भी हो। एक तस्वीर हो, फिर तो फोटो-कॉपी भी बनेगी, फोटो शापिंग भी होगी, मगर कागज केवल, रह गये हाथ में, मूल तो जाने कहाँ ? और कब का छूट गया ?? 🤗

THE QUEUE....