मन का विश्वास, कभी कम हो ना।
हम चलें, नेक रस्ते पे, तेरे,
भूल कर भी, कोई भूल, हो ना।"
🙏
ऐसी प्रार्थना, बहुत विद्यालयों में, नियमित और सामूहिक रूप से की जाती है। हमसे भूल, होती ही, क्यों है, आख़िर ?
सच पूछो, तो हमसे भूल, कभी होती ही नहीं, हो सकती ही नहीं, हम हमेशा सही ही करते हैं, अगर जान लें कि, यह गलत है, तो फिर कर ही ना सकेंगे।
जो भूल कही जाती है, प्रायः होता है, अलग दृष्टिकोण, अपना-अपना, हर किसी का। किसी का गलत, किसी और का सही होता, खूब देखा जाता है।
फिर, दृष्टिकोण का दायरा ? घटनायें अक्सर अकेली नहीं घटतीं, समूह में घटती हैं, और प्रत्येक के अपने प्रभाव। समग्र विचार, बोलें तो, व्यापक दृष्टिकोण। थोड़ा सा गलत हो, अधिकतर सही हो तो, अन्ततः सही ही बचा ना ? काम होता है, सामूहिक, और समीक्षा आंशिक, किसी बिन्दु विशेष पर, केन्द्रित। भूल यहाँ, होती है।
और, कभी देखा भी होगा। हुआ गलत, फिर भी, लाड़-प्यार, इसलिए कि माँ-बाप का मूड अच्छा था। और, जो कभी दोनों झगड़ लिए हों तो, बच्चे अकसर, खांम-खां पिट जाते है, छोटी-मोटी सी बात पर ही, कभी-कभार तो बिना बात के भी।
हम, अपनी ही मनोदशा, सामने वाले पर, प्रक्षेपित कर रहे होते हैं, ठीक किसी आइने की तरह ! हम नहीं होते, गलत, या फिर सही, कोई, अपनी ही छवि, हमारे अन्दर, देख रहा होता है। उसका मन, हम पर्दा, सिनेमा वाले।
"ग़ालिब यही गुनाह, मैं, उम्र भर, करता रहा,
धूल चेहरे पर थी, आइना साफ करता रहा।"
आज के दौर में, यही हो रहा है। आइने, घिस घिस कर, खतम हो चले हैं, कालिख़ है, कि चेहरे पर, फिर भी, गहराती ही जा रही है। अब आइने से ध्यान हटे, नज़र, कभी तो, अपने ही चेहरे पर भी पड़े, तब ना !
एवमस्तु 🙏
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