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 28-06-2021

विडम्बना ही कहें कि जमाने में, "संतुलन" को महत्वानुक्रम में यथोचित स्थान, अभी तक तो उपलब्ध नहीं हो सका। सिवाय इसके कि जब किसी का टोटल बंटाढार हो चुका होता है, तब हम कहते हैं, बैलेन्स आउट हो गया बेचारे का। सोचा समझा न सही, पर है यथार्थ !
बैलेंस, खरे सोने में तांबे का, यानी कीमती होने के बीच काम के भी होने का, आदर्शों के व्यावहारिक और प्रासंगिक भी होने का.... कितने ही उदाहरण । विस्तार के सापेक्ष संक्षिप्त होने का भी, 😜। कुल मिला कर, अतियों के बीच इष्टतम के चुनाव का।
अति-तम की धारणा काल्पनिक है, अस्तित्वहीन, और संतुलन की आवश्यकता सतत उपस्थित, अनिवार्य। वैसे संतुलन स्थिर नहीं, परिवर्तनशील है, समय, स्थान, व्यक्तियों और परिस्थतियों के अनुसार बदलता भी/ही रहता है।
उजाले का गुणगान, तो हर कोई करता है। आज मेरी कोशिश है कि आपकी दोस्ती अंधेरे से भी कराऊँ। सही से देखें, तो ये एक दूसरे के विकल्प नहीं, सम्पूरक हैं । एक का लोप, दूसरे को भी ले ही डूबेगा, कोई और रास्ता है ही नहीं। दुश्मन नाम की चीज, सोचें अगर रहे ही ना, तो दोस्त का कोई अर्थ बचेगा भी। दुश्मनी का ना होना ही, दोस्ती है।
अगले दिन की सुबह कैसे हो पायेगी, अगर बीच में रात से गुजरना ना हो। इन्सान का दिल फैलता है, फिर सिकुड़ता है तो ही धड़कन बनती है, और ये क्रम, बारी-बारी जब तक होता रहता है, तभी तक जीवन। पतंग कोई उड़ती नहीं, अगर आप ढील ही देते जायें, बीच बीच में खिंचाव भी परम आवश्यक है। हे देवियों, अपने अपने देवों को, केवल खींच कर रखने से काम बनता नहीं, बीच बीच में, राहत भी जरूरी है।
जरूरी है कि आप हमेशा सटीक सही ना ही हों, गर्व रास्ता देख लेता है। अच्छा है कभी-कभार गलत भी करें, सही ही करने के तनाव से मुक्त हो जायेंगे, विनम्रता बनी रहेगी और किसी से गाहे बगाहे कुछ गलत हो भी जाय, तो दिलो दिमाग में बर्दाश्त की गुंजायश भी।
याददाश्त अच्छी हो, फायदे की बात है, मगर कुछ बातें भूल जाना भी शुभ। यानी संतुलन, क्या याद रखने जैसा है के साथ-साथ, क्या छोड़ना भी योग्य, मूल्यवान है। आप पढ़ें लिखें, शिक्षित और योग्य बनें, हर कोई चाहता है, मगर तराजू एक तरफ झुकती ही जाये, तो कितने ही लोगों का पारिवारिक जीवन नर्क होते खूब देखा है। तभी तो कोई दुआ करता है
पढ़े लिखों को, थोड़ी-थोड़ी, नादानी दे मौला !
यथार्थ, और सटीक 🙏

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 20-06-2021

भलमनसाहत तो यही है कि, आप कायनात को, उससे ज्यादा देकर जायें जितना आपको मिला है, उससे !
आज मेरा दिन है, पिता का दिन, कम से कम बच्चों के लिये तो है ही। बच्चे जिनमें मेरा जीव है, या फिर विचार हैं, या तो फिर दोनों हैं।
माता पिता, भगवान की बनाई वो एफ डी होते हैं, जो आपसे पहले दुनियाँ में आती है । एफ डी, साधन-सुविधाओं की, संस्कारों की, सुरक्षा की और सलीके की। अगर ठीक-ठीक चले तो इसकी ब्याज ही पार उतार देती है, वर्ना तो ख्वाहिशों का कोई ठिकाना तो होता नहीं।
माता पिता, जैसे साइकल के दो पहिये। माता, जैसे आगे वाला पहिया, साफ सुथरा, हमेशा आंखों के सामने, दिशा देता। कीचड़-गड्ढे से बच बचाकर निकल पाने की सुविधा होती है, इसके पास। साइकल पर सवार बच्चे भी, आम तौर पर, इसी पहिये को जानते पहचानते हैं।
पिता, यानी पीछे वाला पहिया। शायद ही कभी नजर जाती हो उस तरफ। उसके लिये आकर्षक दिखने से ज्यादा जरूरी, स्थिरता और मजबूती होती है, हवा बराबर रखनी पड़ती है। रफ्तार बनी रहे, ये इसी के जिम्मे। अपनी-अपनी भूमिकायें। पहिये साथ-साथ घूमते हैं तो जिन्दगी आगे चलती है। साइकिलें आजकल वैसे, फ्रन्ट व्हील ड्रिवन भी खूब दिखतीं हैं, बोथ व्हील ड्रिवन भी, और मोनो व्हील भी 😀
बच्चे पिता बनने लायक हो गये, समझो, खुद एफ डी हो गये। पिछली एफ डी की ना जरूरत, ना संगति, ज्यादा से ज्यादा एक धरोहर। हम यहीं हैं आज। पिता कैसे रहे, इस बहस का हिस्सा हम नहीं। सभी तो, अच्छा करना चाहते हैं। हुआ कितना ? बच्चे जानें, या फिर समाज, या फिर समय।
जो भी किया, कोई उपकार नहीं। कर्तव्य, सबसे पहले स्वयं के प्रति। एक प्रयास उऋण होने का, अपने पूर्वजों से, समाज से, कायनात से। किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं। बच्चे सुखी हैं, सकुशल हैं और समाज को योगदान में सक्षम, इतना बहुत !
🙏
Suman Singh, Dhirendra Singh and 23 others
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 06-06-2021

"आखिर, मैं हूँ कौन ?"
यह दर्शन, या फिर धर्म का कोई भारी-भरकम निहितार्थ वाला, जटिल सा सवाल नहीं है। ये तो मेरी रोज-मर्रा की जिन्दगी मुझसे, हर बार पूछती है, जब भी खड़ा होता हूँ, आइने के सामने।
और अच्छा लगे, या अच्छा ना भी लगे, सच यही है कि भले हम कभी काजू-किशमिश-बादाम ही क्यों ना रहे हों, वैसे कोई दावा नहीं कि हम वाकई कभी थे ही, अगर रहे होते तो भी क्या, आज की तारीख में, गोबर से ज्यादा कुछ नहीं। चन्द यादें, जिन पर मन हो तो घमंड कर लें, और अत्यन्त सीमित प्रासंगिकता, उपयोगिता।
और हमारी जगह, अगर किस्मत अच्छी हुई तो, उपले की शक्ल में दीवार पर लगा दिये जाते हैं, स्मृति चिन्ह की तरह, धीरे-धीरे सूखने के लिये। सूख जायेंगे तो एक किनारे, करीने से रख जायेंगे। तीज-त्यौहार, अज्ञारी सदृश उपयोगार्थ ।
यह आम नियति है, कोई आ गया है, कोई रास्ते में है। बात, केवल तालमेल की है। आज एक्सप्रैस वे के जमाने में, चेतक का भी क्या उपयोग, संगति नहीं है ना । आउटडेट होते देर लगती है क्या ?
और चेतक, भले सदियों में कोई कोई आता हो, एक्सप्रैस वे पर दौड़ने वाली कारें, हर घड़ी इतनी आ रही हैं, हमेशा पहले से बेहतर । और ये भी पलक झपकते, बीती बात हो जाने वाली हैं।
तो साहब, ठीक से जान लें। इसे चाहे तो निराशाजनक कहें, या सच से साक्षात्कार, और स्वीकारने का अपूर्व अवसर ! अगर ठीक से हो गया, तो देखना, हताशा नहीं, हताशा से मुक्ति ही, इन्तजार करती मिलेगी 👍
अनुपूरक:
गोबर, अगर दिमाग में भरा हो तो चिन्ता की बात हो सकती है। मगर खुद, एक दिन गोबर हो सकने की सामर्थ्य प्राप्त होना सौभाग्य की, और सच में हो ही जाना, निश्चित गौरव की बात है।
सामर्थ्य, यानी भगवान ने आपको इतना भरा-पूरा बनाया हो कि आप बांट भी सकें । साहसी और महामना भी, कि दे ही डालें । कभी किसी सूखी लकड़ी, या पाॅलिथीन को गोबर बनते देखा है ? यह परिणति, उसी को उपलब्ध होती है जिसे भगवान का वरदान, खुले हाथों मिला हो।

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 03-06-2021

बहुत लोग, हमसे शिकायत रखते हैं कि हम काम नहीं, काम की सिर्फ बात करते हैं।
काम किये बिना, किसका काम चला है ? काम तो, हम भी करते हैं, वर्ना किस काम के रहेंगे, मगर हमें पता है, कितना काम, कितने काम का है वर्ना काम की भला कोई इन्तहा होती है, और जो काम, काम ही ना आने वाला हो, वो भला किस काम का।
कभी-कभार बिना काम, काम की सिर्फ बातें भी बड़े काम की होती हैं।
है ना, काम की बात ? 😜

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 01-06-2021

1st June ! It's Apporva's Birthday ...My younger angel 😀
Recalling memories, I can't leave Ice cream out. It was, hope it continues to be, her most cherished delicacy. I'll share an incident, to elaborate.
She would have been, just a few years old, when she had her little finger infected. A pus filled boil. Doctor, pretending examination, pressed it hard, and it burst. Excruciating pain, She cried vehemently, the wound was cleaned and dressed up quickly, nevertheless.
Now, the doctor smiled, and spoke to the still crying Apoorva, "What baby ? It's over. No reason to continue crying, now ! "
Then happened the magic. Apoorva, wiped her tears, and was grinning again, ear to ear, the very next moment. I learnt my lesson, "NO POINT, CRYING OVER THE SPILLED MILK. LET'S EXPLORE, IF WE CAN SALVAGE
Doctor was highly impressed, too. He offered a treat, to Apoorva. Checked up, what does she likes most ? Ice cream, came the reply. So, he requested me to go, and get her Ice cream first, prescription and medicines will wait.
When I told him to finish, with prescription, and medicines first, and assured to take the Ice cream along, while returning. He thought, I was trying to evade. I clarified, that a candy won't do. It has to be a brick, family size. He cross checked with Apoorva, "Which Ice cream, do you like to have, beta ?". Apoorva, too young to express in words, replied with gesture, palm facing each other, and a space to accommodate a full Ice cream brick, in between.
Some philosophy. Life is like an Ice cream, too. It's meant to be tasted, relished and shared. No way, to keep it intact, preserve it indefinitely. It'll stink, and render futile, even to the owner.
Shouldn't try to hold, more than necessary. You won't enjoy, but waste most of it. You shouldn't be impatient, either. You might drop it on your lap, or the floor. Wasted, and nuisance to clean up, too. Tastes best, enjoyable most, when you nibble, positive, appropriate, regular, and slow.
If you do nothing, it's going to melt off, anyway. 😜

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 04-05-2021

श्रीमद्भभगवद्गीता, आस्तिकों के लिए धार्मिक, या फिर दैवीय उद्गार हैं, साक्षात, स्वयं भगवान के श्रीमुख से अवतरित। परन्तु अन्य प्रज्ञावानों के लिए भी, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका महत्व साधारण नहीं। और इसका सर्वाधिक चर्चित सूत्र : "कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन:", आपको उपलब्धि के अहंकार और असफलता के अपराध बोध से तत्काल मुक्त करता है।
पूरे जीवन, विज्ञान से मेरा नजदीक का नाता रहा है, और इसकी उत्तरोत्तर प्रगति को मैंने देखा भी है और सराहा भी है, मगर विज्ञान की सीमा है, भले उस सीमा का विस्तार, नियमित और तेजी से हो रहा हो, और कुदरत का फैलाव है असीमित, हरि अनन्त - हरि कथा अनन्ता । सम्भव ही नहीं है कि किसी दिन विज्ञान, कुदरत पर नियंत्रण पा ले। विज्ञान तो, स्वयं कुदरत का ही अंश हुआ।
तो अस्पतालों में, चिकित्सकों के परामर्श कक्षों में आप बहुत बार, यह घोषित पाएंगे, "हम केवल इलाज करते हैं, ठीक तो वही करता है", यह घोषणा उपरोक्त सूत्र वाक्य की, स्वीकारोक्ति ही है। अपनी सीमायें, फिर वो कितनी ही दुखद, कितनी ही अप्रिय और कितनी ही दर्द भरी क्यों ना हों, हमें स्वीकार करनी ही होंगी। इस "हम" में, मैं स्वयं भी सम्मिलित हूँ ।
समय बहुत कड़ी परीक्षा ले रहा है, परीक्षा आपके धैर्य की, संयम की, साहस की, और जो नियंत्रण से बाहर है उसके समक्ष समर्पण की । इसे दुर्भाग्य कहें, या कुछ भी, अगर व्यवस्था अपर्याप्त सिद्ध हो रही है, कुछ लोग आपदा में भी अवसर ढूँढ रहे हैं, राजनीति जन-कल्याण पर भारी हो रही है, तो यह सब भी दुर्भाग्य ही तो है।
दुखद है, मगर सच भी है कि व्यवस्था की अपनी सीमायें भी हमेशा होती हैं, चाहे चिकित्साकर्मी हो, प्रशासन या कोई भी और, अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, और प्रत्युत्तर में सराहना ना सही, अगर केवल आलोचना, या तिरस्कार ही मिले तो ये तो थके मांदे घोड़े को चाबुक मारना ही हुआ, जरा सोचिए । अगर घोड़ा ही बैठ गया तो ?
मेरा आशय, किसी भी तरह से, कोरोना से संघर्ष में किसी ढिलाई का पक्ष लेना नहीं है, सावधानी हर तरह की, भय किसी तरह का नहीं। कोरोना से हो रहा नुकसान दिखता है, कोरोना के डर से हो रहे नुकसान की तरफ, उतना ध्यान नहीं जाता । बचिये साहब, ना बच पायें तो लड़िये और लड़ाई में जीत ना पायें तो विनम्रता से स्वीकारिये ।
यही नियति है, आपका अधिकार, और आपका कर्तव्य, कर्म और कोशिश तक ही जाता है, आगे जैसी उसकी मर्जी 🙏

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 13-04-2021

"आप काटेंगे तो वही, जो आपने बोया होगा"
यह नियम कुदरत का है, और शास्वत है, कोई हेराफेरी इसमें हो सकती नहीं, आम बोया तो आम, नीम बोया तो नीम, अगर नीम को, आम समझ के बोया तो ? तो भी नीम !
बहुत बार, किसी को आप से लगाव होता है, आपके माता पिता, दोस्त या फिर जीवन साथी, या कोई भी... ये अपने हिस्से का आम, आपको देकर, नीम खुद ले लेते है, जैसे, कोई आपको खुश देखने को, झूठी तारीफ करता जाये, और आप इस भ्रम में रहे आते हैं कि आम की फसल, आप ही का बोया है।
फिर एक दिन, आपके हितैषी के पास और आम बचते नहीं, या फिर उसके शरीर की नीम लेने की क्षमता भी चुक जाती है, सीमा तो हर क्षमता की होती है, और विवशता में, आपका सामना नीम से होता है, जो वास्तव में, आप ही की बोर्ड हुई होती है।
आप क्या करें ? सच को स्वीकारें, कोई विकल्प नहीं, और अब से ही सही, नीम बोना बन्द करें, आम बोयें । थोड़ा सा धैर्य, और नीम की मौजूदा खेप के बाद, आपको निश्चित ही आम मिलने वाले हैं, यह गारन्टी कुदरत की है, कभी खाली नहीं ना जाती।
🙏

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 05-09-2020



आज 5 सितम्बर, महामहिम राष्ट्रपति स्वर्गीय डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पूर्व शिक्षक, का जन्मदिन और तदनुसार घोषित शिक्षक दिवस। सभी शिक्षकों को सादर, साभार परम नमन 🙏
शिक्षक, यानी वे महापुरुष, जिनकी शिक्षा से मैं आज जहाँ हूँ, पहुंच सका हूँ, मगर जिनके बावजूद ? और अगर वह भी शिक्षक ही रहे हों, तो उनका क्या ?
शिक्षक एक पद नहीं, एक संकल्प है,अपने ज्ञान,अपनी सकारात्मकता को, किसी उत्सुक को हस्तांतरण कर सकने की, इच्छायुक्त क्षमता का। पद वाछिंत हो सकता है, अनिवार्य नहीं और पर्याप्त भी नहीं । शिक्षक कोई भी हो सकता है, आप की पत्नी भी, प्रायः होती भी है !
शिक्षक की योग्यता क्या होनी चाहिए, कोई मापदण्ड नहीं । देने वाले के पास, कुछ ना कुछ देने लायक हो, और लेने वाले के पास इच्छा हो, यह सम्बन्ध रिवर्सिबिल भी हो सकता है। अन्तर जितना कम हो, हस्तांतरण उतना ही सहज और आन्नददायक । नहाने में जितना अच्छा, कम गहरी नदी में आता है, समन्दर में कहाँ ?
समन्दर से याद आया, विद्यादान में शिक्षक के पास ज्ञान का भंडार कितना है, अधिक महत्व उस ज्ञान के प्रति उत्सुकता जगाने, बनाये रखने और अन्ततः उसे हस्तांतरित कर पाने की योग्यता का होता है। विद्वान आवश्यक रूप से, अच्छे शिक्षक नहीं होते।
शिक्षक के लिये, ज्ञानार्थी के प्रति संवेदनशील होना कम महत्वपूर्ण नहीं है । विद्यार्थी की कठिनाइयों को शिक्षक सही सही अनुभव कर सके तो ही उपयुक्त। जो अपनी शिक्षा अटक अटक पाये हों, शिक्षक अक्सर कमाल के पाये जाते है।
शिक्षक कोई भी हो सकता है, पद और उपाधि के बिना भी, और इसकी आवश्यकता जीवन पर्यंत रहती है ! तो शिक्षक और उनके प्रति आदर भाव चिरंजीवी होता है।
शिक्षक की पदवी, किसी का अधिकार नहीं, उसी के छात्र द्वारा प्रदत्त पुरस्कार है, काश, सभी इतना समझ सकें 😃

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 05-09-2019



आज शिक्षक दिवस है, पता नहीं
बधाई
की बात है या अफसोस की, साल में केवल एक दिन... गुरु तो हर दिन, हर पल आपके साथ रहना ही चाहिए, सही रास्ता चुनने में आपकी मदद करे, फिजीकली ना सही, सोच में तो कोई बाधा नहीं ! असल में, कन्सेप्ट ही बदल गया है, आज शायद यही प्रासंगिक भी है।
आजकल पुरानी बातें खूब याद आती हैं । पापा के साथ-साथ किसी एक स्कूल से दो क्लास पास नहीं की। हाईस्कूल में आये, सरस्वती विद्या मंदिर इण्टर कालेज, आगरा, श्री रमेश चन्द्र मित्तल थे क्लास और इंगलिश टीचर । सौभाग्य से मेधावी विद्यार्थी की पहचान बहुत सघन और शीघ्रता से मिली। मित्तल साहब का आकलन, और सब तो असाधारण, मगर इंगलिश मे में बेहतरी की अनेक सम्भावनाएँ । इसके सामान्य तात्पर्य, ट्यूशन, को उन्होंने विनम्रता मगर दृढ़ता से ठुकरा दिया। मुझे तो वेतन ही अपनी सभी योग्यताओं को, अपने शिष्यों को बांट देने का मिलता है, हां, मेरी भी वित्तीय आवश्यकताऐं हैं, ट्यूशन भी करता हूँ, या करना पड़ता है मगर अपने ही विद्यालय के बच्चों का कदापि नहीं। इस तर्क पर, कि सब्जैक्ट टीचर के होते मेरी ताकत और कमजोरियाँ, उनसे अच्छा कौन जानेंगे, वह सहमत हुये। पूरे साल, विशेष प्रयास मगर बिना किसी अनुतोष ! कुछ समय बाद वह आगरा छोड़कर, सम्भवतः कुरुक्षेत्र चले गये, मगर एक तरह से अभी भी मेरे साथ हैं ।
तीन चार साल बाद ही, मेरे छोटे भाई के सन्दर्भ में, परिस्थितियों ने स्वयं को दोहराया। शिक्षक का नाम लिया जाना भी उपयुक्त नहीं, वही परिस्थितियां, परन्तु हुआ ठीक विपरीत। स्वतः ट्यूशन की सलाह, इस बार स्वयं शिक्षक महोदय द्वारा भिजवाई गई और ट्यूशन भी हुआ, केवल ट्यूशन !
अब तो लगभग 50 वर्ष, पुल के नीचे कितना ही पानी बह चुका, बिना विस्तार में गये, जोखिम बहुत है इसमें 😜, अब ना वो शिक्षक रहे, ना वो शिष्य ... ना वो समाज, ना वो मूल्य । जो हो रहा है, लगता है वही होता रहे तो भी बहुत । मेरी ओर से अनेक बधाइयाँ और शुभकामनाएं ! हां, मित्तल साहब को, वे जहाँ भी हों, श्रद्धा नमन 🙏

ख़याल, आज का, मिजाज़ आज का !

 दो उदार हृदय मिलेंगे, तो चमत्कार होगा। उनका सभी-कुछ, एक दूसरे का होगा। छीन-झपट कोई नहीं। 


जीवन में, दोनों का साथ-साथ, और आगे ही आगे बढ़ना, उतना ही पक्का, जैसे सूरज का उदय होना ! 👍

THE QUEUE....